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Showing posts from July, 2022

मां ब्रह्मचारिणी देवी दुर्गा के नौ रूपों में से दूसरा रूप हैं। नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है।

 मां ब्रह्मचारिणी देवी दुर्गा के नौ रूपों में से दूसरा रूप हैं। नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। मां ब्रह्मचारिणी का अर्थ: "ब्रह्म" का अर्थ है "तपस्या" और "चारिणी" का अर्थ है "जो तपस्या करती है"। मां ब्रह्मचारिणी को तपस्या और संयम की देवी माना जाता है। मां ब्रह्मचारिणी की कथा: मां ब्रह्मचारिणी ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठिन तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया कि वे उनकी पत्नी बनेंगी। मां ब्रह्मचारिणी की विशेषताएं: - मां ब्रह्मचारिणी को शक्ति और संयम की देवी माना जाता है। - वे अपने भक्तों को तपस्या और संयम की शक्ति प्रदान करती हैं। - मां ब्रह्मचारिणी की पूजा से व्यक्ति को आध्यात्मिक ज्ञान और शक्ति प्राप्त होती है। मां ब्रह्मचारिणी की पूजा: नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। इस दिन विशेष रूप से मां ब्रह्मचारिणी की आराधना की जाती है और उन्हें फूल, फल और अन्य चीजें चढ़ाई जाती हैं।

भगवान शंकर, शुक्राचार्य और मृतसंजीवनी विद्या!!!!!!!!

 भगवान शंकर, शुक्राचार्य और मृतसंजीवनी विद्या!!!!!!!! मृत्युंजयो मृत्युमृत्यु: कालकालो यमान्तक:। वेदस्त्वं वेदकर्ता च वेदवेदांगपारग:।। (हिमालयकृत शिवस्तोत्र ६) अर्थात्–‘हे परम शिव! आप मृत्युंजय होने के कारण मृत्यु की भी मृत्यु, काल के भी काल तथा यम के भी यम हैं। वेद, वेदकर्ता तथा वेद-वेदांगों के पारंगत विद्वान भी आप ही हैं।’ (पर्वतराज हिमालय की स्तुति) भारतीय संस्कृति में भगवान शिव देवाधिदेव रूप में पूज्य हैं। औढरदानी आशुतोष शिव सुर-असुर, दानव-मानव सबके निर्विवाद आराध्य हैं। भक्त के शुद्ध भाव का आभास पाते ही बिना परीक्षा लिए वे प्रकट होकर उसकी मनोकामना पूरी करते हैं। ऐसे सर्वप्रिय, भक्तवत्सल, सर्वसुलभ भगवान शंकर द्वारा भृगुपुत्र शुक्राचार्य को मृतसंजीवनी विद्या प्रदान करने वाले प्रसंग का यहां वर्णन किया गया है। ब्रह्माजी के पौत्र शुक्राचार्य (कवि) ब्रह्माजी के देवर्षि नारद, अंगिरा और भृगु तीन मानस पुत्र थे। अंगिरा के पुत्र बृहस्पति थे और भृगु के पुत्र का नाम कवि (शुक्र) था। महर्षि अंगिरा बृहस्पति और कवि को शिक्षा देने लगे और भृगु तपस्या के लिए वन में चले गए।  कवि कुशाग्रबुद्धि...

सत्संग महिमा,रामचरितमानस के सुन्दर कांड,मानस से!!!!!!

 सत्संग महिमा,रामचरितमानस के सुन्दर कांड,मानस से!!!!!! तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग। तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥   हे तात! स्वर्ग और मोक्ष के सब सुखों को तराजू के एक पलड़े में रखा जाए, तो भी वे सब मिलकर (दूसरे पलड़े पर रखे हुए) उस सुख के बराबर नहीं हो सकते, जो लव (क्षण) मात्र के सत्संग से होता है॥  प्रविसि नगर कीजै सब काजा। हृदय राखि कोसल पुर राजा।। भाई एक और प्रश्न, कि सुन्दर कांड की इस सुन्दर पंक्ति पर बिचार किया जाय।स्वागत योग्य प्रसंग है--देखें-- हनुमानजी ने तो पूरी लंका में ही सत्संग के द्वारा प्रभाव डाला था,पर हनुमानजी के सत्संग का प्रभाव दो ब्यक्तियों पर बड़ा गहरा पड़ा।एक तो लंकिनी पर और दूसरे विभीषण पर। लंकिनी पर तो घुसते ही उनके सत्संग का विशिष्ट प्रभाव पड़ा।कैसे?-- हनुमानजी ने सोचा कि छोटे बनकर लंका में घुसें पर,रावण का सुरक्षा तंत्र इतना सुदृढ़ था कि,ज्यों ही घुसने लगे,लंकिनी ने हनुमानजी को पकड़ लिया-- नाम लंकिनी एक निसिचरी।सो कहँ चलेसि मोहिं निंदरी।। हनुमान जी ने लंकिनी से पूछा कि क्या लंका में सब भूखे ही भूखे रहते हैं?जो मिलता है,वही खाने के लिए...

द्वारिका धाम की यात्रा पांच मिनट में करें!!!!!!!!

 अगर आपके पास कुछ समय है तो आओ पण्डितजी के साथ चार धामों में से एक द्वारिका धाम की यात्रा पांच मिनट में करें!!!!!!!!  गुजरात के देवभूमि द्वारका जिले में स्थित एक नगर तथा हिन्दू तीर्थस्थल है। यह हिन्दुओं के साथ सर्वाधिक पवित्र तीर्थों में से एक तथा चार धामों में से एक है। यह सात पुरियों में एक पुरी है। जिले का नाम द्वारका पुरी से रखा गया है। यह नगरी भारत के पश्चिम में समुन्द्र के किनारे पर बसी है। हिन्दू धर्मग्रन्थों के अनुसार, भगवान कॄष्ण ने इसे बसाया था। यह श्रीकृष्ण की कर्मभूमि है। आधुनिक द्वारका एक शहर है। कस्बे के एक हिस्से के चारों ओर चहारदीवारी खिंची है इसके भीतर ही सारे बड़े-बड़े मन्दिर है। काफी समय से जाने-माने शोधकर्ताओं ने पुराणों में वर्णित द्वारिका के रहस्य का पता लगाने का प्रयास किया, लेकिन वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित कोई भी अध्ययन कार्य अभी तक पूरा नहीं किया गया है। 2005 में द्वारिका के रहस्यों से पर्दा उठाने के लिए अभियान शुरू किया गया था। इस अभियान में भारतीय नौसेना ने भी मदद की। अभियान के दौरान समुद्र की गहराई में कटे-छटे पत्थर मिले और यहां से लगभग 200 अन्य नमू...

राम से बड़ा राम का नाम!!!!!!!

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 राम से बड़ा राम का नाम!!!!!!! उत्तर रामायण के अनुसार अश्वमेघ यज्ञ पूर्ण होने के पश्चात भगवान श्रीराम ने बड़ी सभा का आयोजन कर सभी देवताओं, ऋषि-मुनियों, किन्नरों, यक्षों व राजाओं आदि को उसमें आमंत्रित किया, सभा में आए नारद मुनि के भड़काने पर एक राजन ने भरी सभा में ऋषि विश्वामित्र को छोड़कर सभी को प्रणाम किया।  ऋषि विश्वामित्र गुस्से से भर उठे और उन्होंने भगवान श्रीराम से कहा कि अगर सूर्यास्त से पूर्व श्रीराम ने उस राजा को मृत्यु दंड नहीं दिया तो वो राम को श्राप दे देंगे, इस पर श्रीराम ने उस राजा को सूर्यास्त से पूर्व मारने का प्रण ले लिया, श्रीराम के प्रण की खबर पाते ही राजा भागा-भागा हनुमानजी की माता अंजनी की शरण में गया तथा बिना पूरी बात बतायें उनसे प्राण रक्षा का वचन मांग लिया।  तब माता अंजनी ने हनुमानजी को राजन की प्राण रक्षा का आदेश दिया, हनुमानजी ने श्रीराम की शपथ लेकर कहा कि कोई भी राजन का बाल भी बांका नहीं कर पायेगा, परंतु जब राजन ने बताया कि भगवान श्रीराम ने ही उसका वध करने का प्रण किया है, तो हनुमान जी धर्म संकट में पड़ गये कि राजन के प्राण कैसे बचायें और माता का ...

“रामायण” क्या है??

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 “रामायण” क्या है??  अगर कभी पढ़ो और समझो तो आंसुओ पे काबू रखना....... रामायण का एक छोटा सा वृतांत है, उसी से शायद कुछ समझा सकूँ... 😊 एक रात की बात हैं, माता कौशल्या जी को सोते में अपने महल की छत पर किसी के चलने की आहट सुनाई दी।  नींद खुल गई, पूछा कौन हैं ? मालूम पड़ा श्रुतकीर्ति जी (सबसे छोटी बहु, शत्रुघ्न जी की पत्नी)हैं । माता कौशल्या जी ने उन्हें नीचे बुलाया | श्रुतकीर्ति जी आईं, चरणों में प्रणाम कर खड़ी रह गईं माता कौशिल्या जी ने पूछा, श्रुति ! इतनी रात को अकेली छत पर क्या कर रही हो बेटी ?  क्या नींद नहीं आ रही ? शत्रुघ्न कहाँ है ? श्रुतिकीर्ति की आँखें भर आईं, माँ की छाती से चिपटी,  गोद में सिमट गईं, बोलीं, माँ उन्हें तो देखे हुए तेरह वर्ष हो गए । उफ !  कौशल्या जी का ह्रदय काँप कर झटपटा गया । तुरंत आवाज लगाई, सेवक दौड़े आए ।  आधी रात ही पालकी तैयार हुई, आज शत्रुघ्न जी की खोज होगी,  माँ चली । आपको मालूम है शत्रुघ्न जी कहाँ मिले ? अयोध्या जी के जिस दरवाजे के बाहर भरत जी नंदिग्राम में तपस्वी होकर रहते हैं, उसी दरवाजे के भीतर एक पत्थर की शिला है...
 एक बार अवश्य पढे शायद? एक चतुर व्यक्ति को काल से बहुत डर लगता था। एक दिन उसे चतुराई सूझी और काल को अपना मित्र बना लिया,उसने अपने मित्र काल से कहा- मित्र, तुम किसी को भी नहीं छोड़ते हो, किसी दिन मुझे भी गाल में धर लोगे। काल ने कहा- ये मृत्यु लोक है. जो आया है उसे मरना ही है. सृष्टि का यह शाश्वत नियम है इस लिए मैं मजबूर हूं. पर तुम मित्र हो इसलिए मैं जितनी रियायत कर सकता हूं, करूंगा ही. मुझ से क्या आशा रखते हो साफ-साफ कहो। व्यक्ति ने कहा- मित्र मैं इतना ही चाहता हूं कि आप मुझे अपने लोक ले जाने के लिए आने से कुछ दिन पहले एक पत्र अवश्य लिख देना ताकि मैं अपने बाल- बच्चों को कारोबार की सभी बातें अच्छी तरह से समझा दूं और स्वयं भी भगवान भजन में लग जाऊं। काल ने प्रेम से कहा- यह कौन सी बड़ी बात है, मैं एक नहीं आपको चार पत्र भेज दूंगा. चिंता मत करो. चारों पत्रों के बीच समय भी अच्छा खासा दूंगा ताकि तुम सचेत होकर काम निपटा लो। मनुष्य बड़ा प्रसन्न हुआ सोचने लगा कि आज से मेरे मन से काल का भय भी निकल गया, मैं जाने से पूर्व अपने सभी कार्य पूर्ण करके जाऊंगा तो देवता भी मेरा स्वागत करेंगे। दिन बीतते गय...

रहस्य है या विज्ञान ?

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 यह रहस्य है या विज्ञान ? आप सभी को जानना चाहिए हर 12 साल में महाप्रभु की मूर्ती को बदला जाता है,उस समय पूरे पुरी शहर में ब्लैकआउट किया जाता है यानी पूरे शहर की लाइट बंद की जाती है। लाइट बंद होने के बाद मंदिर परिसर को crpf की सेना चारो तरफ से घेर लेती है...उस समय कोई भी मंदिर में नही जा सकता... मंदिर के अंदर घना अंधेरा रहता है...पुजारी की आँखों मे पट्टी बंधी होती है...पुजारी के हाथ मे दस्ताने होते है..वो पुरानी मूर्ती से "ब्रह्म पदार्थ" निकालता है और नई मूर्ती में डाल देता है...ये ब्रह्म पदार्थ क्या है आजतक किसी को नही पता...इसे आजतक किसी ने नही देखा. ..हज़ारो सालो से ये एक मूर्ती से दूसरी मूर्ती में ट्रांसफर किया जा रहा है... ये एक अलौकिक पदार्थ है जिसको छूने मात्र से किसी इंसान के जिस्म के चिथड़े उड़ जाए... इस ब्रह्म पदार्थ का संबंध भगवान श्री कृष्ण से है...मगर ये क्या है ,कोई नही जानता... ये पूरी प्रक्रिया हर 12 साल में एक बार होती है...उस समय सुरक्षा बहुत ज्यादा होती है...  मगर आजतक कोई भी पुजारी ये नही बता पाया की महाप्रभु जगन्नाथ की मूर्ती में आखिर ऐसा क्या है ???  कुछ...

भगवान शंकर ने ली श्रीराम की मर्यादा की परीक्षा!!!!!

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 भगवान शंकर ने ली श्रीराम की मर्यादा की परीक्षा!!!!! प्रलयकाल में संसार का भात की तरह भोजन करने वाले भगवान शंकर की क्षुधा कैसे शान्त की मां अन्नपूर्णा ने और भगवान शंकर राम सभा के कथावाचक कैसे बने ? रोचक प्रसंग । भगवान (शंकर (विश्वनाथ) की अर्धांगिनी हैं माता अन्नपूर्णा । माता पार्वती ही सृष्टिकाल में महामाया, पालन करते समय अन्नपूर्णा और संहार करते समय कालरात्रि कहलाती हैं । भगवान शंकर का परिवार बहुत लम्बा है—स्वयं शंकरजी पंचानन, पुत्र गजानन और षडानन, तीन बहुएं, दो पोते फिर इन सबके वाहन; इसके अलावा नन्दी-भृंगी एवं श्रृंगी और बहुत खाने वाले भूत-प्रेतों का समुदाय । इन सबकी क्षुधा-पिपासा शान्त करने का जिम्मा माता अन्नपूर्णा का है । माता अन्नपूर्णा की आराधना करने से मनुष्य को कभी अन्न का दु:ख नहीं होता है क्योंकि वे नित्य अन्न-दान करती हैं । यदि माता अन्नपूर्णा अपनी कृपादृष्टि हटा लें तो मनुष्य दर-दर अन्न-जल के लिए भटकता फिरे लेकिन उसे चार दाने चने के भी प्राप्त नहीं होते हैं । एक बार भगवान शंकर की आज्ञा से माता अन्नपूर्णा ने महर्षि वेदव्यास की तरफ से दृष्टि फेर ली, वेदव्यासजी अपने शिष्य...

माता सती के देह त्यागने के पीछे का रहस्य(रामायण के बालकाण्ड से)!!!!!!!

 माता सती के देह त्यागने के पीछे का रहस्य(रामायण के बालकाण्ड से)!!!!!!! कहते हैं कि जब माता सीता को रावण हरण करके ले गया तो प्रभु श्री राम जी उनके वियोग में वन उपवन भटक रहे हैं और मनुष्यों की भांति विरहसे व्याकुल होकर सीता को खोजते फिर रहे हैं।जिनके कभी कोई संयोग वियोग नहीं है, उनमें प्रत्यक्ष दुख देखा गया।  श्री रघुनाथ जी का चरित्र बड़ा ही विचित्र है, उसको पहुंचे हुए ज्ञानी जन ही जानते हैं। भगवान श्री शिव जी ने उसी अवसर पर श्री राम जी को देखा और उनके हृदय में बहुत भारी आनन्द उत्पन्न हुआ। श्री राम जी को शिव जी ने नेत्र भरकर देखा, परंतु अवसर ठीक न जानकर परिचय नहीं दिया।   शिव  जी ने नतमस्तक होकर कहा जगत को पवित्र करने वाले भगवान सच्चिदानंद की जय हो, और वहां से शिव जी चल पड़े। कृपा के सागर शिव जी आनन्द विभोर होते हुए सती जी के साथ चले जा रहे थे। सती जी मन ही मन सोच रही थी कि भोले शंकर का सारा जग वंदना करता है, वे जगत के ईश्वर हैं, देवता, मनुष्य और बडे़ बडे़ साधु संत सभी उन्हें सिर नवाते हैं। आज उन्होंने एक राजपुत्र को सच्चिदानंद परधाम कहकर प्रणाम किया और उनकी शोभा देखक...

भगवान श्रीकृष्ण और माया!!!!!!

 भगवान श्रीकृष्ण और माया!!!!!! माया महा ठगनी हम जानी। तिरगुन फांस लिए कर डोले, बोले मधुरे बानी ।। केसव के कमला वे बैठी, शिव के भवन भवानी । पंडा के मूरत वे बैठीं, तीरथ में भई पानी ।। योगी के योगन वे बैठी, राजा के घर रानी । काहू के हीरा वे बैठी, काहू के कौड़ी कानी ।। भगतन की भगतिन वे बैठी, ब्रह्मा के ब्रह्माणी । कहत कबीर सुनो भाई साधो, यह सब अकथ कहानी ।।  (कबीर) कबीरदासजी का कहना है कि माया महा ठगिनी है जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता । यह सत्व, रज, तम—इन तीन गुणों की फांसी लेकर और मीठी वाणी बोलकर जीव को बंधन में जकड़ देती है । माया या योगमाया!!!!!! भगवान की यह योगमाया उनकी अत्यन्त प्रभावशाली वैष्णवी ऐश्वर्यशक्ति है जिसके वश में सम्पूर्ण जगत रहता है । उसी योगमाया को अपने वश में करके भगवान लीला के लिए दिव्य गुणों के साथ मनुष्य जन्म धारण करते हैं और साधारण मनुष्य से ही प्रतीत होते हैं । इसी मायाशक्ति का नाम योगमाया है । गीता (४।६) में भगवान श्रीकृष्ण का कथन है—‘मैं अजन्मा और अविनाशी तथा समस्त प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी योगमाया से प्रकट होता हूँ।’ म...

ठाकुर श्रीकृष्ण के श्री रुक्मिणी जी के साथ गृहस्थ जीवन की शुरुआत में प्रथम पुत्र के रूप में साक्षात् कामदेव के अवतार प्रद्युम्न आए हैं!!!!!!

 ठाकुर श्रीकृष्ण के श्री रुक्मिणी जी के साथ गृहस्थ जीवन की शुरुआत में प्रथम पुत्र के रूप में साक्षात् कामदेव के अवतार प्रद्युम्न आए हैं!!!!!! जब जदुबंस कृष्न अवतारा। होइहि हरन महा महिभारा॥ कृष्न तनय होइहि पति तोरा। बचनु अन्यथा होइ न मोरा॥ रति गवनी सुनि संकर बानी। कथा अपर अब कहउँ बखानी॥ भगवान शंकर रति से कहते हैं कि जब पृथ्वी के बड़े भारी भार को उतारने के लिए यदुवंश में श्री कृष्ण का अवतार होगा, तब तेरा पति उनके पुत्र (प्रद्युम्न) के रूप में उत्पन्न होगा। मेरा यह वचन अन्यथा नहीं होगा॥  शिवजी के वचन सुनकर रति चली गई। अब आगे की कथा विस्तार से कहता हूँ।   श्री शुकदेव जी महाराज कहते हैं - हे राजन! बालक प्रद्युम्न अभी दस दिन के भी नहीं हुए थे कि कामरूपी शम्बरासुर वेष बदलकर आया और सूतिकागृह से उनका हरण करके ले गया और समुद्र में फेंककर अपने घर लौट आया क्योंकि शम्बरासुर को पता था कि ये मेरा भावी काल है तो क्यों न बाल्यकाल में ही इसे मार दिया जाए। परंतु शम्बरासुर यह भूल गया था कि *हम कुछ भी कर सकते हैं, परंतु भगवान को आने से और मौत को आने से नहीं रोक सकते। और एक भक्त को इन दो को कभ...
 जाने,वैकुण्ठ में लक्ष्मी, द्वारकापुरी में रुक्मिणी, सत्यभामा व एक हजार आठ पटरानियों और व्रजगोपियों में श्रीराधा ही क्यों है श्रीकृष्ण को सबसे प्रिय और सर्वशिरोमणि ? श्रीकृष्ण के रोग की अनोखी दवा क्या है !!!!!!! उन्मादिनी-सी वृषभानुकिशोरी श्रीराधा सिर पर स्वर्णकलसी लिए घर से पनघट और पनघट से घर, न जाने कितनी बार आयीं और गयी; बार-बार उनके नेत्र यमुनातट पर कदम्ब की शीतल छाया में त्रिभंगी मुद्रा में खड़े नन्दनन्दन के रूप का पान करते नहीं थकते थे। व्रज में वृषभानुकिशोरी श्रीराधा और व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण के मिलन की चर्चा चारों ओर फैलने लगी। व्रजगोपियों को तो यह सुनकर आनन्द होता था किन्तु व्रज में दो स्रियां ऐसी थीं जिनके मन में यह मिलन शूल की तरह चुभता था। वे दोनों मां-बेटी अपने को अनुसूइया और सावित्री की तरह सती मानती थीं और वृषभानुदुलारी श्रीराधा के चरित्र पर संदेह करती थीं। वे दोनों यह नहीं जानती थीं कि जगत के भूत, वर्तमान और भविष्य का सारा सतीत्व श्रीकिशोरीजी की सत्ता पर टिका हुआ है। वे जानतीं भी कैसे? भगवान की लीलाओं की सूत्रधार योगमाया उन्हें यह जानने ही नहीं दे रही थी। यदि वे ...

रामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड,अंजनानंदन कीअतिशयभूख,सत्प्रेरकश्लाघ्य!!!!!!!

 रामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड,अंजनानंदन कीअतिशयभूख,सत्प्रेरकश्लाघ्य!!!!!!! सुनहु मातु मोहिं अतिसय भुखा। लागि देखि सुन्दर फल रूखा।। मित्रों!जब तक हमें संसार की वस्तुओं की भूख है,तब तक हम उसको मिटाने की चेष्टा करेंगे,पर जब हमें भगवान की भूख लग जाय और हनुमानजी की तरह तीब्र हो जाय,तो भगवान के मिलने में बिलम्ब नहीं होगा। एक दिन प्रातःकाल ही गोस्वामी तुलसीदास जी,प्रभु के द्वार पर खड़े हो गये और पुकारने लगे कि भूखे को भोजन कराइए!!भूखे को भोजन कराइए! प्रभु स्वयं निकलकर बाहर चले आए और पूछा कि इतने सबेरे ही भूख लग गई? बोले-महाराज!मैं अनेक दिनों का भूखा हूँ,दोपहर तक की प्रतीक्षा कैसे करूँ?और रट लगा दी!!मुझे तो एक कौर भी भोजन नहीं मिला। भगवान ने पूछा-कहाँ से आ रहे हो? बोले-महाराज!ऐसे स्थान से आया हूँ,जहाँ अकाल पड़ा हुआ है। कलियुग,स्वयं अकाल है।वहाँ के सब ब्यक्ति भूख और प्यास से बेचैन हैं। भगवान ने कहा-यदि अकाल पड़ा होता तो मेरे दरवाज़े पर हजारों की भीड़ लग जाती।लेकिन तुम अकेले दिखाई पड़ रहे हो,कैसे मानूँ?- तब तुलसीदासजी ने एक नयी बात कही।बोले कि अकाल पड़ने से कुछ लोग तो जो मिल गया उसी से पेट भर लेते है...

, भागवतजी के एक अद्भुत प्रसंग का दर्शन करेंगे, कैसा विचित्र दर्शन?

 मित्रों, भागवतजी के एक अद्भुत प्रसंग का दर्शन करेंगे, कैसा विचित्र दर्शन?  स्वयंभू मनु महाराज की पुत्री, जो फूलों में पली राजकुमारी देवहूति, इतने बड़े वैभवशाली महाराज की पुत्री, जिसकी शादी ऐसे पुरुष के साथ हो रही है जिसके पास रहने के लिये मकान तक नहीं, वह भी एक शर्त के साथ कि एक पुत्र होते ही हम गृहस्थ जीवन को छोड़ देंगे, यह बात मंजूर हो तो शादी करें। कर्दमजी को भगवान् श्रीहरि ने वरदान दिया था मैं स्वयं पुत्र के रूप में आप के घर जन्म लूंगा, कर्दमजी ने सोचा कि पुत्र तो स्वयं भगवान् ही बनकर आयेंगे, फिर दूसरे पुत्र की कामना क्यों रखूं, इसलिये वो बोले कि एक पुत्र के होते ही हम गृहस्थ जीवन का त्याग कर देंगे, स्वयंभू मनु ने स्वीकृति दे दी, देवहूती का विवाह कर्दम ऋषि के साथ हो गया, राजकुमारी है उनकी पत्नी, अपनी पत्नी को लेकर अपनी प्रणकुटी में आये। एकदम नितांत जंगल में घास की छोटी सी प्रणकुटी, देवहूती ने जैसे ही अपने पति की कुटी में प्रवेश किया तो ऊपर की ओर देखने पर, वहां कम से कम पचास घोंसले बने हैं पक्षियों के, उनमें सुन्दर-सुन्दर चिड़ियाँ कलरव कर रही हैं, देवहूति ने पूछा पतिदेव यह ...

शुभ-अशुभ कर्म का फल अवश्य भोगना पड़ता है!!!!!!!!!

 शुभ-अशुभ कर्म का फल अवश्य भोगना पड़ता है!!!!!!!!! कर्मों की गति बड़ी गहन होती है । कर्म की गति जानने में देवता भी समर्थ नहीं हैं, मानव की तो बात ही क्या है ? काल के पाश में बंधे हुए समस्त जीवों को अपने द्वारा किये गये शुभ अथवा अशुभ कर्मों का फल निश्चित रूप से भोगना ही पड़ता है ।  मनुष्य कर्म-जंजाल में फंसकर मृत्यु को प्राप्त होता है और फिर कर्मफल के भोग के लिए पुनर्जन्म धारण करता है । पृथ्वी पर जो मनुष्य-देह है, उसमें एक सीमा तक ही सुख या दु:ख भोगने की क्षमता है । जो पुण्य या पाप पृथ्वी पर किसी मनुष्य-देह के द्वारा भोगने संभव नही, उनका फल जीव स्वर्ग या नरक में भोगता है । पाप या पुण्य जब इतने रह जाते हैं कि उनका भोग पृथ्वी पर संभव हो, तब वह जीव पृथ्वी पर किसी देह में जन्म लेता है । धर्मराज (यमराज) सभी प्राणियों को उनके पाप-पुण्य का फल प्रदान करते हैं; लेकिन जब उनसे कोई गलती हो जाए तो क्या उन्हें माफ किया जा सकता है ? नहीं, कभी नहीं ! एक गलत कर्म से धर्मराज को भी दासीपुत्र के रूप में जन्म लेना पड़ा । इसीलिए गोस्वामी तुलसीदासजी ने कहा है— करम प्रधान बिस्व करि राखा । जो जस करइ तो...