सत्संग महिमा,रामचरितमानस के सुन्दर कांड,मानस से!!!!!!
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सत्संग महिमा,रामचरितमानस के सुन्दर कांड,मानस से!!!!!!
तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥
हे तात! स्वर्ग और मोक्ष के सब सुखों को तराजू के एक पलड़े में रखा जाए, तो भी वे सब मिलकर (दूसरे पलड़े पर रखे हुए) उस सुख के बराबर नहीं हो सकते, जो लव (क्षण) मात्र के सत्संग से होता है॥
प्रविसि नगर कीजै सब काजा। हृदय राखि कोसल पुर राजा।।
भाई एक और प्रश्न, कि सुन्दर कांड की इस सुन्दर पंक्ति पर बिचार किया जाय।स्वागत योग्य प्रसंग है--देखें--
हनुमानजी ने तो पूरी लंका में ही सत्संग के द्वारा प्रभाव डाला था,पर हनुमानजी के सत्संग का प्रभाव दो ब्यक्तियों पर बड़ा गहरा पड़ा।एक तो लंकिनी पर और दूसरे विभीषण पर। लंकिनी पर तो घुसते ही उनके सत्संग का विशिष्ट प्रभाव पड़ा।कैसे?--
हनुमानजी ने सोचा कि छोटे बनकर लंका में घुसें पर,रावण का सुरक्षा तंत्र इतना सुदृढ़ था कि,ज्यों ही घुसने लगे,लंकिनी ने हनुमानजी को पकड़ लिया--
नाम लंकिनी एक निसिचरी।सो कहँ चलेसि मोहिं निंदरी।।
हनुमान जी ने लंकिनी से पूछा कि क्या लंका में सब भूखे ही भूखे रहते हैं?जो मिलता है,वही खाने के लिए कहता है? सबको भूख लगी है क्या?
लंकिनी ने कहा कि, देख नहीं रहा है!लंका में इतना सोना है,इतना वैभव है,इतने भोज्य पदार्थ हैं।लंका में भूखा कौन है?तो हनुमानजी ने कहा कि,यदि लंका में कोई भूखा नहीं है,तो तुम मुझे खाना क्यों चाहती हो?तो तुरन्त लंकिनी ने कहा,जानता नहीं!मैं महान आदर्शवादी महिला हूँ,सिद्धान्तवादी महिला हूँ,इसलिए मैं तुम्हें खाना चाहती हूँ।
हनुमानजी ने कहा कि,तुम्हारा आदर्श क्या है?
तो तुरन्त लंकिनी ने कहा--
मोर अहार जहाँ लगि चोरा।
मैंने चोरी मिटाने का ब्रत लिया है,इसलिए मैं चोरों को खा जाती हूँ।तुझे खाने का कारण चोरों को मिटाना ही है,भूख नहीं। बस ज्यों ही हनुमानजी ने सुना,तुरन्त उठकर खड़े हुए,और कसकर एक मुक्का लगाया।
लंकिनी मुँह के बल गिरी और मुँह से रक्त गिरने लगा।और उसके बाद हाथ जोड़कर खड़ी हो गयी और कहने लगी--
तात स्वर्ग अपवर्ग सुख धरिय तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग।।
आपके सत्संग से मैं धन्य हो गयी।पढ़ करके बड़ी हँसी आती है कि मुक्केबाजी भी कोई सत्संग है क्या?
हनुमानजी ने कोई भाषण तो दिया नहीं लंकिनी के सामने,केवल एक मुक्का कस के मारा और वह कहने लगी बढ़िया सत्संग हुआ।
पर आप बिचार करके देखिए,तो सत्संग मुक्केबाजी ही है।पर अगर उसकी सही चोट लगे तो।यह बात और है कि मुक्के बरसते रहते हैं और मुक्के बरसने के बाद भी कभी संसार के राग रूपी रक्त नहीं बहता,कभी मुँह के बल नहीं गिरते।
रावण को भी हनुमानजी ने मुक्का मारा ।और जब मुक्का लगा तो रावण भी थोड़ी देर के लिए अचेत हो गया,और उठा तो कहा बंदर!तेरे मुक्के में बड़ी शक्ति है।हनुमानजी ने तो सिर पीट लिया।रावण ने कहा कि मैं तुम्हारी प्रशंसा कर रहा हूँ और तुम सिर पीट रहे हो?
तो हनुमानजी ने कहा--
धिग धिग मम पौरुष धिग मोही। जौं तैं जिअत रहेसि सुरद्रोही।।
जब तुम नहीं मरे,तो प्रशंसा कैसी?प्रशंसा तो तब है जब सत्संग के प्रहार से मोह मर जाए।तब तो मुक्के का ठीक प्रभाव है।पर सत्संग का प्रहार होने के बाद भी मोह ज्यों
का त्यों बना रहे,तो सत्संग का प्रभाव ही क्या रहा?
मुक्के का प्रभाव लंकिनी पर ठीक पड़ा।मुक्के का प्रभाव मानें? हनुमानजी ने लंकिनी को मुक्का क्यों मारा?वही,लंकिनी का जो भ्रम था,उसे नष्ट किया।हनुमानजी को लंकिनी चोर क्यों कह रही थी?
वह मानती थी कि लंका का स्वामी रावण है और इस नगर में रात्रि के समय जो छोटा सा बनकर घुसना चाहता है,वह चोर है।हनुमानजी ने मुक्का मारकर गिरा दिया,इसका अर्थ क्या हुआ?
हनुमानजी ने कहा,पहले चोर और साहूकार की परिभाषा तो समझ ले,क्या?
अगर तेरा ब्रत यही था कि जो चोर है,उसी को खाऊँगी,तो सबसे पहले रावण को खाती,जो सीताजी को चुरा कर लाया है।मैं तो चोरी का पता लगाने आया हूँ।चोर तो रावण है,और जो चोर है,उसको तू स्वामी समझ बैठी है।और मुझे समझ बैठी कि मैं चोर हूँ।तेरा तो मस्तिष्क ही उल्टा है।इसलिए तुझे मुक्के की आवश्यकता है,ताकि तेरा दिमाग ठिकाने आ जाय।और हुआ भी यही।लंकिनी ने तुरंत हनुमानजी से कह दिया।क्या?
प्रबिसि नगर आइए,आइए,महाराज भीतर!अरे!अभी तक तो तू मुझे चोर कह रही थी और अब कह रही हो कि--
प्रबिसि नगर कीजै सब काजा। हृदय राखि कोसल पुर राजा।।
लंकिनी ने कहा कि महाराज!मैं भूल से समझती थी कि मैं रावण की चेरी हूँ,और लंका का स्वामी रावण है।पर आपके प्रहार से ऐसा लगने लगा कि सच्चा स्वामी तो ईश्वर है।ऐसी परिस्थिति में तुम ईश्वर का काम करने जा रहे हो,तो ईश्वर को हृदय में रखकर प्रवेश करो।
और दूसरी भ्रान्ति विभीषण के मन में भी थी।इनका भी सत्संग के माध्यम से भ्रम दूर होता है।यद्यपि उनको मुक्के लगाने के स्थान पर प्यार से समझाया गया।और उसका परिणाम यह होता है कि जीव(विभीषण)के अंतःकरण में मोह(रावण)के प्रति वितृष्णा उत्पन्न होती है,और जीव अन्त में मोह का परित्याग करके,भगवान की शरण में जाता है।
और जब भगवान की शरण में आता है,तो जीवन का एक और अपवाद,एक और अंतर सामने आता है।और वह क्या? भाई!कहा जाता है कि जो प्रेय चाहेगा,उसे श्रेय नहीं मिलेगा और जो श्रेय चाहेगा उसे प्रेय नहीं मिलेगा।पर विभीषण के प्रसंग में रामचरितमानस का दर्शन यही है कि,नहीं!नहीं!परमार्थ और स्वार्थ दोनों एक साथ रह सकते हैं,मिल सकते हैं।दोनों एक दूसरे का पूरक बन सकते हैं।
ईश्वर का आश्रय लेने पर,विभीषण(जीव)जब ईश्वर को शरणागत होता है तो,परमार्थिक दृष्टि से उसने ईश्वर को प्राप्त कर लिया।और भौतिक दृष्टि से अन्ततोगत्वा वह लंका का स्वामी बना। स्वार्थ और परमार्थ दोनों की सिद्धि ईश्वर के द्वारा होती है।यह सत्संग का ही प्रभाव है।
गोस्वामीजी ने लिखा है--
*सठ सुधरहिं सतसंगति पाई। पारस परस कुधात सुहाई॥
बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं। फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं॥
भावार्थ:-दुष्ट भी सत्संगति पाकर सुधर जाते हैं, जैसे पारस के स्पर्श से लोहा सुहावना हो जाता है (सुंदर सोना बन जाता है), किन्तु दैवयोग से यदि कभी सज्जन कुसंगति में पड़ जाते हैं, तो वे वहाँ भी साँप की मणि के समान अपने गुणों का ही अनुसरण करते हैं।
(अर्थात् जिस प्रकार साँप का संसर्ग पाकर भी मणि उसके विष को ग्रहण नहीं करती तथा अपने सहज गुण प्रकाश को नहीं छोड़ती, उसी प्रकार साधु पुरुष दुष्टों के संग में रहकर भी दूसरों को प्रकाश ही देते हैं, दुष्टों का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।)॥
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