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जाने,वैकुण्ठ में लक्ष्मी, द्वारकापुरी में रुक्मिणी, सत्यभामा व एक हजार आठ पटरानियों और व्रजगोपियों में श्रीराधा ही क्यों है श्रीकृष्ण को सबसे प्रिय और सर्वशिरोमणि ? श्रीकृष्ण के रोग की अनोखी दवा क्या है !!!!!!!
उन्मादिनी-सी वृषभानुकिशोरी श्रीराधा सिर पर स्वर्णकलसी लिए घर से पनघट और पनघट से घर, न जाने कितनी बार आयीं और गयी; बार-बार उनके नेत्र यमुनातट पर कदम्ब की शीतल छाया में त्रिभंगी मुद्रा में खड़े नन्दनन्दन के रूप का पान करते नहीं थकते थे। व्रज में वृषभानुकिशोरी श्रीराधा और व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण के मिलन की चर्चा चारों ओर फैलने लगी। व्रजगोपियों को तो यह सुनकर आनन्द होता था किन्तु व्रज में दो स्रियां ऐसी थीं जिनके मन में यह मिलन शूल की तरह चुभता था। वे दोनों मां-बेटी अपने को अनुसूइया और सावित्री की तरह सती मानती थीं और वृषभानुदुलारी श्रीराधा के चरित्र पर संदेह करती थीं। वे दोनों यह नहीं जानती थीं कि जगत के भूत, वर्तमान और भविष्य का सारा सतीत्व श्रीकिशोरीजी की सत्ता पर टिका हुआ है। वे जानतीं भी कैसे? भगवान की लीलाओं की सूत्रधार योगमाया उन्हें यह जानने ही नहीं दे रही थी। यदि वे दोनों किशोरीजी के स्वरूप को जान लेतीं तो फिर भगवान अपनी लीला का माधुर्य जगत में कैसे बिखेरते?
श्रीराधा का जीवन कृष्णमय था। ‘तत्सुखसुखित्वम्–प्रियतम श्रीकृष्ण के सुख में ही अपना सुख मानना।’ किशोरीजी के मन पर इस लोकनिन्दा का तिलमात्र भी प्रभाव नहीं था। कोई उनसे प्रश्न करता तो वे केवल रो देतीं और कुछ कह नहीं पातीं। इन्हीं दोनों स्त्रियों के कारण किशोरीजी का उदाहरण देकर व्रजसुन्दरियों की सासें उनसे कहतीं कि तुम को यमुना में नहाने में इतनी देर कैसे हो गयी? व्रज जिसका उपहास करता है, तुम उस राधा का संग करती हो। वह तो बड़े बाप की बेटी है, यह सब उन्हीं को अच्छा लगता है, तुम लोगों को यह जगत का उपालम्भ (ताना) सहा नहीं जाएगा–
कब की गई न्हान तुम जमुना,यह कहि कहि रिस पावै।
राधा कौ तुम संग करति हौ,ब्रज उपहास उड़ावै।।
वा है बड़े महर की बेटी,तौ ऐसी कहवावै।
सुनहु सूर यह उनहीं भावै,ऐसे कहति डरावै।।
जिसके हृदय में श्रीकृष्ण का दिव्यप्रेम है, वही श्रीराधा के प्रेम को समझ सकता है; सभी लोग नहीं। वृषभानुनन्दिनी की आलोचना जब सीमा का उल्लंघन कर गयी तब भगवान श्रीकृष्ण की योगमाया ने जान लिया कि उसे अब किस लीला का आयोजन करना है, और शुरु हो गया भगवान का लीलामाधुर्य।
एक दिन नन्दरानी ने देखा कि उनका प्राणधन नीलमणि गोशाला में मूर्च्छित पड़ा है। वे गोशाला की ओर चीखती हुई दौड़ीं–‘हाय रे हाय! मेरे नीलमणि को क्या हो गया?’ श्रीकृष्ण के सखाओं ने रोते हुए बताया कि कन्हैया नाचते हुए बेहोश होकर गिर गया। श्रीकृष्ण के अंग तेज ज्वर से तप रहे थे, नाड़ी भी द्रुतगति से चल रही थी और नेत्र ऐसे बन्द थे मानो गर्मी से मुरझाकर खिला कमल बन्द हो गया हो। व्रजराज नन्द ने गोकुल के आसपास सब जगह ड्योंढ़ी पिटवा दी कि जो वैद्य व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण को स्वस्थ कर देगा उसे मुंहमांगा पुरस्कार दिया जाएगा।
कुछ समय बाद सघन वन की तरफ से अद्वितीय तेज से युक्त एक नवयुवक वैद्य आया। आश्चर्य! उस वैद्य का रूप-लावण्य नन्दनन्दन के समान था। उसे देखकर यशोदाजी के मुख से सहसा निकल पड़ा–’बेटा! नीलमणि!’ फिर अपने आपको संभालकर बोली–’वैद्यराज! मेरे प्राणधन नीलमणि को आप स्वस्थ कर दें, कितनी देर से मेरे पुत्र की मूर्च्छा (बेहोशी) नहीं टूटी है। आप जो मांगेंगे वह पुरस्कार मैं आपको दूंगी।’ वैद्यराज ने व्रजेश्वरी यशोदा से कहा–’जैसा मैं कहता हूँ वैसा ही करो।’
तरुण वैद्य ने एक कलसी (गागर) मंगाकर स्वर्ण कील से उसमें सैंकड़ों छेद कर दिए। फिर अपनी झोली से कैंची निकालकर श्रीकृष्ण के केशों की एक लट काट ली और एक-एक केश जोड़कर क्षणभर में ही केशों की एक लम्बी पतली डोर बना ली। उसे लेकर वह यमुनातट पर गए। केशडोर के एक छोर को तमालवृक्ष से बांध दिया और डोर के दूसरे छोर को यमुनाजी के दूसरी पार स्थित तमालवृक्ष से बांध दिया।। इतना सब करके वैद्यराज व्रजेश्वरी यशोदा से बोले–
’उपाय यह है कि कोई सती स्त्री श्रीकृष्ण के केशों से बनी इस डोर पर चलती हुई यमुनाजी के उस पार तीन बार जाए और लौट कर आए; फिर इस छिद्रयुक्त कलसी में यमुनाजल लाकर श्रीकृष्ण पर छिड़के तो उनकी चेतना वापिस आ जाएगी।’
यशोदाजी ने अपना माथा पकड़ लिया–’क्या व्रज में ऐसी कोई सती है जो ऐसा साहस कर सके!’ वैद्य ने कहा–’व्रजरानी सती की महिमा अपार है, सच्ची सती शून्य में भी चल सकती है, आकाश में जल स्थिर कर सकती है, फिर व्रज तो सतियों के लिए प्रसिद्ध है।’
निराश होकर व्रजरानी स्वयं कलसी भरने चलीं पर वैद्यराज ने उन्हें रोकते हुए कहा–’मैं जानता हूँ कि आप इस छिद्रवाली कलसी में जल ला सकती हैं; परन्तु तुम्हारे कुल से अलग किसी अन्य स्त्री के हाथ से जल आना चाहिए।’
वैद्यराज ने गोपियों की ओर देखा परन्तु गोपियों ने कहा–’वैद्यराज! हम तो श्यामकलंकिनी हैं, हमारे द्वारा लाए गए जल से श्रीकृष्ण चैतन्य नहीं होंगे।’
कोऊ कहे कुलटा कुलीन-अकुलीन कोऊ,
रीति-नीति जग से बनाये सब न्यारी हौं।
तब यशोदाजी ने व्रजप्रसिद्ध सती–उन दोनों मां-बेटी से जल लाने की प्रार्थना की। दोनों बड़े गर्व से इठलाती हुई कलसी भरने चलीं। जैसे ही बेटी ने श्रीकृष्णकेश की डोरी पर पैर रखा, वह टूट कर यमुनाजल में नाचने लगी। मानो कह रही हो–वृषभानुनन्दिनी की निन्दा करने वाली को मैं उस पार नहीं ले जाऊंगी। डोरी टूटने से वह श्रीराधानिन्दक यमुना की लहरों में डूबने लगी। यमुनाजी भी रोष में उसे डुबो देना चाहतीं थीं पर व्रजवासियों ने उसे बचा लिया। वैद्यराज ने पुन: श्रीकृष्णकेश से डोरी तैयार की। इस बार वृद्धा की परीक्षा थी। परन्तु जो दशा बेटी की हुई वही उसकी जननी की भी हुई। सिर नीचा कर वे वैद्यराज से बोलीं–‘यदि हम जल नहीं ला सके तो सतियों में श्रेष्ठ पार्वती भी इस विधान से जल नहीं ला सकतीं।’ यशोदाजी रोने लगीं–’हाय, मेरे नीलमणि का क्या होगा?’
तब वैद्यराज ज्योतिषगणना का नाटक करने लगे और व्रजेश्वरी से बोले–’व्रज में एक परम सती हैं। उन सती की चरण-रज से सारा संसार पावन होगा। उनका नाम ‘राधा’ है, उन्हें बुलाओ।’
श्रीराधा को इस घटना का पता नही है। वे वृषभानुमहल के एकान्त में श्रीकृष्ण-चिन्तन में लीन होकर अश्रुपूर्ण नेत्रों से पुष्पों की माला गूंथ रही थीं और अपने प्रियतम को अपने हृदय की बात सुना रही थीं–
‘इस त्रिभुवन में तुम्हारे अतिरिक्त मेरा और कौन है? ‘राधा’ कहकर मुझे पुकारने वाला तुम्हारे सिवा और कोई भी तो नहीं है। इस गोकुल में कौन है जिसे मैं अपना कहूँ। सब जगह ज्वाला है एकमात्र तुम्हारे चरणकमल ही शीतल हैं; मुझे इन शीतल चरणों में स्थान दे दो। मेरे स्पर्शमणि! तुम्हें ही तो मैं अपने अंगों का भूषण बनाकर गले में धारण करती हूं।’ (चण्डीदास)
जैसे ही किशोरीजी ने व्रजेश्वरी यशोदा का आदेश सुना, वह विक्षिप्त की भांति दौड़ती हुई गोशाला में पहुंच गईं और समस्त आदरणीयजनों को प्रणाम कर कलसी में जल भरने चलीं। सबसे पहले उन्होंने अपने प्रियतम के केशों से निर्मित उस डोर को प्रणाम किया। फिर उस पर अपने कोमल चरण रख कर चल पड़ीं। किशोरीजी को देखकर यमुनाजी भी उमंग में भरकर ऊंची-ऊंची लहरों के रूप में नाचने लगीं। यमुनापुलिन पर खड़े सब व्रजवासी ‘सती की जय, वृषभानुकिशोरी की जय’ का घोष कर रहे थे।
तीन बार किशोरीजी केशसेतु पर इस पार से उस पार हो आईं फिर सहस्त्र छिद्रों वाली कलसी को यमुनाजल से भरकर सिर पर रखा और गोशाला की ओर चल पड़ीं। देवतागण आकाश से तो पुष्पवर्षा कर ही रहे थे, गोप और गोपियों ने इतनी पुष्पवर्षा की कि गोकुल का सारा पथ ही पुष्पमय हो गया। श्रीराधा ने यमुनाजल से भरी कलसी ले जाकर वैद्यराज के सामने रख दी।। वैद्यराज ने सजल नेत्रों से श्रीराधा से कहा–’तुम्हीं अपने पवित्र हस्तकमलों से एक अंजलि जल नन्दनन्दन के मुख पर छिड़क दो।’ जैसे ही किशोरीजी ने श्रीकृष्ण के मुख पर जल छिड़का, वे ऐसे उठकर बैठ गए मानो सोकर उठे हों–
राधा तू बड़भागनी कौन तपस्या कीन।
तीन लोक तारनतरन वो तेरे आधीन।।
श्रीकृष्णचिन्तन में लीन किशोरीजी वृषभानुपुर की ओर जा रही हैं। कुछ देर पहले ही जो व्रजस्त्रियां उनके चरित्र पर धूल उड़ाया करतीं थीं, अब उनकी चरणरज को अपने आंचल में रख रही हैं। गोप-गोपियां, व्रज के वृद्ध सभी–श्रीराधा की चरणरज से रंजित पथ पर लोट-लोटकर अपने को भाग्यवान महसूस कर रहे हैं।
जिन श्रीकृष्ण के ऐश्वर्य और माधुर्य के लिए समस्त जगत लालायित और मोहित है, वे भुवनमोहन श्रीकृष्ण भी जिनके द्वारा मोहित हैं, वह श्रीराधा कितना और कैसा महान स्वरूप हैं, इसे शब्दों में कहना संभव नहीं–
कृष्णप्रेयसी कान्तागण में सर्वशिरोमणी श्रीराधा।
लक्ष्मी-महिषी-गोपीजन की मूल, मुकुटमणि श्रीराधा।। (भाई हनुमानप्रसादजी पोद्दार)
अर्थात्–श्रीकृष्ण की कान्ताओं के तीन प्रकार हैं–वैकुण्ठ में लक्ष्मी, द्वारकापुरी में रुक्मिणी, सत्यभामा आदि पटरानियां और व्रजांगनाएं। इन सबमें श्रीराधा सर्वशिरोमणि और इन सबकी मूल शक्ति हैं व इन सबके मस्तकों के मुकुट स्वयं श्रीकृष्ण की भी मणिस्वरूपा हैं।
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