रामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड,अंजनानंदन कीअतिशयभूख,सत्प्रेरकश्लाघ्य!!!!!!!
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रामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड,अंजनानंदन
कीअतिशयभूख,सत्प्रेरकश्लाघ्य!!!!!!!
सुनहु मातु मोहिं अतिसय भुखा।
लागि देखि सुन्दर फल रूखा।।
मित्रों!जब तक हमें संसार की वस्तुओं की भूख है,तब तक हम उसको मिटाने की चेष्टा करेंगे,पर जब हमें भगवान की भूख लग जाय और हनुमानजी की तरह तीब्र हो जाय,तो भगवान के मिलने में बिलम्ब नहीं होगा।
एक दिन प्रातःकाल ही गोस्वामी तुलसीदास जी,प्रभु के द्वार पर खड़े हो गये और पुकारने लगे कि भूखे को भोजन कराइए!!भूखे को भोजन कराइए! प्रभु स्वयं निकलकर बाहर चले आए और पूछा कि इतने सबेरे ही भूख लग गई?
बोले-महाराज!मैं अनेक दिनों का भूखा हूँ,दोपहर तक की प्रतीक्षा कैसे करूँ?और रट लगा दी!!मुझे तो एक कौर भी भोजन नहीं मिला।
भगवान ने पूछा-कहाँ से आ रहे हो?
बोले-महाराज!ऐसे स्थान से आया हूँ,जहाँ अकाल पड़ा हुआ है।
कलियुग,स्वयं अकाल है।वहाँ के सब ब्यक्ति भूख और प्यास से बेचैन हैं।
भगवान ने कहा-यदि अकाल पड़ा होता तो मेरे दरवाज़े पर हजारों की भीड़ लग जाती।लेकिन तुम अकेले दिखाई पड़ रहे हो,कैसे मानूँ?-
तब तुलसीदासजी ने एक नयी बात कही।बोले कि अकाल पड़ने से कुछ लोग तो जो मिल गया उसी से पेट भर लेते हैं।वे कलियुगी प्राणी हैं,परन्तु मैं ऐसा नहीं हूँ।
मैं भिखारी तो हूँ,परन्तु मैंने निर्णय किया है कि जो मिल जाय सो नहीं खाऊँगा।
प्रभु को हँसी आ गयी कि अच्छा यह तो नयी बात है कि भिखारी अपनी ओर से शर्त्त लाद रहा है।
भगवान ने पूछा-यहाँ कैसे आ गये?
गोस्वामीजी बोले -कि मैं भूखा था और संसार के बिषयों के द्वारा भूख मिटी नहीं और मैं मिटाना चाहता भी नहीं।फिर ब्याकुल होकर कहाँ जाऊँ?तब मैंने संतों से जाकर पूछा कि मुझ जैसे भिखारी को भी कोई खिलाने वाला है?तो-
"तिन्ह कह्ये कोसलराजु।"
उन्होंने आप का नाम लिया---विनयपत्रिका में यह लिखा उन्होंने-----
"द्वार हौं भोर ही को आजु।
रटत रिरिहा आरि और न,कौर ही तें काजु।।
कलि कराल दुकाल दारुन,सब कुभाँति कुसाजु।
नीच जन,मन ऊँच,जैसे कोढ़ में की खाजु।।
हहरि हिय में सदय बूझ्यो जाइ साधु-समाजु।
मोहुसे कहुँ कतहुँ कोउ,तिन्ह कह्यो कोसलराजु।।"(वि.प.219)
अतः मैं यह जानने के लिए आया हूँ कि सन्तों ने जो आपकी प्रशंसा की है,वह केवल प्रशंसा मात्र ही है कि उसमें कुछ सार भी है?
अन्त में प्रभु को पूछना ही पड़ा कि कब से भूखे हो और किस भोजन से तुम्हारी भूख मिटेगी? तो गोस्वामीजी ने कहा कि-
"जनम को भूखो भिखारी हौं गरीबनवाजु।
पेट भरि तुलिसिहि जेंवाइय भगति-सुधा-सुनाजु।।"(वि.प.219)
--मैं तो जन्मजात भूखा हूँ।मुझे एक टुकड़ा नहीं लेना है,मेरी पहली शर्त्त है कि आपको यदि भोजन कराना है तो मुझे "पेट भरि" चाहिए,मैं भरपेट खाऊँगा।
भोजन कौन सा करोगे?भक्ति का जो दिब्य रसीला भोजन है,वह कराइए,जिससे हमारी जन्म-जन्मान्तर की भूख मिट जाय और तब भगवान ने प्रसन्न हो करके तुलसीदास को ऐसा भोजन कराया कि उनकी भूख मिट गयी।
मानसानुरागी विशिष्टजन!हनुमानजी ने भी अशोकवाटिका में माँ से यही माँगा था कि मैं भूखा हूँ।माँ ने बरदान दिया कि-
"अजर अमर गुननिधि सुत होहू।
करहिं बहुत रघुनायक छोहू।।"
अजर बना दिया,अमर बना दिया,फिर भी भूख नहीं मिटी।
हनुमानजी ने कहा कि मैं तो आपके कृपा के मीठे फल को पाने के लिए ब्यग्र हूँ।ये लंका के लोग कितने अभागे हैं कि आपके आने के बाद भी इनकी भूख नहीं मिटी,पर माँ आप कृपा करके मेरी भूख मिटायें।
तब माँ ने आदेश दिया कि-
"रघुपति चरन हृदय धरि,तात मधुर फल खाहु।"
फिर तो हनुमानजी ने फल खाया और फिर बड़ा अनोखा काम कर दिया-
"फल खाएसि तरु तोरै लागा।"
बृक्षों को उखाड़ फेंका और रोकने वाले राक्षसों की खूब पिटाई की।माँ ने फल खाने की आज्ञा दी थी,पर बाग उजाड़ने की आज्ञा नहीं दी थी।फिर आपने बाग क्यों उजाड़ दिया?
हनुमानजी ने कहा-हाँ मैंने फल खाने की आज्ञा ली थी,पर बाग का उजड़ना तो फल खाने का फल है।भक्ति का भोजन जब माँ करा देती है तो उससे इतनी शक्ति प्राप्त हो जाती है कि लगता है कि जब तक मोह की बाटिका को उखाड़ कर फेंकन दें,जब तक दुर्गुण-दुर्विचारों को मारकर समाप्त न कर दें,तब तक फल खाने का सच्चा फल ही क्या मिला?
फल खाने का सच्चा फल यही है कि रावण की बाटिका के बृक्षों को समूल नष्ट करदिया जाय और उन राक्षसों को जो माँ को कष्ट पहुँचाने की चेष्टा कर रहे हैं,उनकोनष्ट कर दिया जाय।
श्रीराम जय राम जय जय राम।
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