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Showing posts from September, 2022

मां ब्रह्मचारिणी देवी दुर्गा के नौ रूपों में से दूसरा रूप हैं। नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है।

 मां ब्रह्मचारिणी देवी दुर्गा के नौ रूपों में से दूसरा रूप हैं। नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। मां ब्रह्मचारिणी का अर्थ: "ब्रह्म" का अर्थ है "तपस्या" और "चारिणी" का अर्थ है "जो तपस्या करती है"। मां ब्रह्मचारिणी को तपस्या और संयम की देवी माना जाता है। मां ब्रह्मचारिणी की कथा: मां ब्रह्मचारिणी ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठिन तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया कि वे उनकी पत्नी बनेंगी। मां ब्रह्मचारिणी की विशेषताएं: - मां ब्रह्मचारिणी को शक्ति और संयम की देवी माना जाता है। - वे अपने भक्तों को तपस्या और संयम की शक्ति प्रदान करती हैं। - मां ब्रह्मचारिणी की पूजा से व्यक्ति को आध्यात्मिक ज्ञान और शक्ति प्राप्त होती है। मां ब्रह्मचारिणी की पूजा: नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। इस दिन विशेष रूप से मां ब्रह्मचारिणी की आराधना की जाती है और उन्हें फूल, फल और अन्य चीजें चढ़ाई जाती हैं।

भगवान का प्यारा भक्त कौन होता है??????

 भगवान का प्यारा भक्त कौन होता है?????? * मम गुन गावत पुलक सरीरा। गदगद गिरा नयन बह नीरा॥ काम आदि मद दंभ न जाकें। तात निरंतर बस मैं ताकें॥ भावार्थ:-मेरा गुण गाते समय जिसका शरीर पुलकित हो जाए, वाणी गदगद हो जाए और नेत्रों से (प्रेमाश्रुओं का) जल बहने लगे और काम, मद और दम्भ आदि जिसमें न हों, हे भाई! मैं सदा उसके वश में रहता हूँ॥ भगवान कोरे ज्ञान या कोरे कर्मकाण्ड, व व्रत-उपवास आदि से प्रसन्न होने वाले नहीं हैं, उनको ‘भक्त’ चाहिए । गले में माला डाल देने से, त्रिपुण्ड लगा लेने से, रामनामी ओढ़ लेने से ही कोई भक्त नहीं हो जाता । वह स्वभाव क्या है, जिससे आकर्षित होकर भगवान भक्त को खोजते फिरें, उसका पता पूछें, उससे मिलने के लिए रोते फिरें, अपने भक्त की चाकरी करें, वे गुण जिसके कारण भक्त भगवान को अत्यन्त प्यारा लगने लगता है—यह जानने की जिज्ञासा हर प्रेमीभक्त को होती है । भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के 12वें अध्याय के श्लोक 13-20 में अपने प्यारे भक्त के गुण या लक्षण बताए हैं– अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्र: करुण एव च । निर्ममो निरहंकार: समदु:खसुख: क्षमी ।।13।। संतुष्ट: सततं योगी यतात्मा दृढ़निश्चय: ।...

श्री हनुमानजी का राम-नाममय विग्रह!!!!!!!!!

 श्री हनुमानजी का राम-नाममय विग्रह!!!!!!!!! ‘राम नाम’ कीर्तन की श्री हनुमानजी का राम-नाममय विग्रह!!!!!!!!! ‘राम नाम’ कीर्तन की अति ऊंची अवस्था में पहुंचे हुए साधक का रोम-रोम भगवन्नाममय हो जाता है, ऐसे इतिहास में बहुत से उदाहरण हैं; परन्तु हनुमानजी तो उन सबमें विरले हैं । उनके रोम-रोम में तो राम-नाम अंकित है ही; उनके वस्त्र, आभूषण, आयुध--सब राम-नाम से बने हैं । जानें हनुमानजी की ‘राम नाम’ प्रियता की सरस कथाएं ।                  राम माथ, मुकुट राम, राम सिर, नयन राम, राम कान, नासा राम, ठोड़ी राम नाम है। राम कंठ, कंध राम, राम भुजा, बाजूबंद, राम हृदय, अलंकार, हार राम नाम है।। राम उदर, नाभि राम, राम कटि, कटि-सूत्र, राम वसन, जंघ राम, जानु-पैर राम हैं। राम मन, वचन राम, राम गदा, कटक राम, मारुति के रोम रोम व्यापक राम नाम है।। अपने आराध्य श्रीराम की सेवा के लिए शंकरजी का हनुमान अवतार!!!!!! त्रेतायुग में जब मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने पृथ्वी पर अवतार लेने का निश्चय किया, तब उनके पृथ्वी पर आने से पहले ही सभी देवता अपने-अपने अंशों से वानर तथा भ...

मूर्ति में क्यों बसते हैं भगवान?

मूर्ति में क्यों बसते हैं भगवान? क्यों भगवान मूर्ति में उपस्थित हो जाते हैं और पत्थर की मूर्ति भगवान बन जाती है ? भगवान के अर्चावतार से सम्बधित एक भक्ति कथा । किसी नए काम को शुरू करने से पहले या किसी स्थान पर जाने से पहले यह कहा जाता है कि मंदिर के दर्शन अवश्य करने चाहिए। इसके पीछे मान्यता यह है कि मंदिर के वातावरण में मौजूद सकारात्मक ऊर्जा आपके मस्तिष्क को स्वच्छ और सजीव कर, आपको सही दिशा में सोचने के लिए विवश करे। भक्तों की उपासना के लिए मूर्ति में बसते हैं भगवान:- अन्तर्यामी रूप से भगवान सबके हृदय में हर समय विद्यमान रहते हैं, सिद्ध, योगी आदि समाधि में भगवान के अन्तर्यामी रूप का दर्शन कर सकते हैं परन्तु सभी लोग इस रूप में भगवान के दर्शन का आनन्द नहीं ले पाते हैं।  भक्त अपने इष्ट का दर्शन कैसे करें? इसलिए भक्तों को दर्शन देने के लिए भगवान ने अर्चावतार धारण किया जो भगवान का सभी के लिए सबसे सुलभ रूप है। अर्चा का अर्थ है पूजा उपासना; इसके लिए होने वाले अवतार का नाम है अर्चावतार, मूर्तियों का ही दूसरा नाम अर्चावतार है। घर में, मन्दिरों में, तीर्थस्थानों पर, गोवर्धन आदि पर्वतों पर प्र...

श्राद्ध में अर्पित सामग्री पितरों को कैसे मिलती है?

 श्राद्ध में अर्पित सामग्री पितरों को कैसे मिलती है? ‘श्रद्धया दीयते यत् तत् श्राद्धम्।’   ‘श्राद्ध’ का अर्थ है श्रद्धा से जो कुछ दिया जाए। पितरों के लिए श्रद्धापूर्वक किए गए पदार्थ-दान (हविष्यान्न, तिल, कुश, जल के दान) का नाम ही श्राद्ध है। श्राद्धकर्म पितृऋण चुकाने का सरल व सहज मार्ग है। पितृपक्ष में श्राद्ध करने से पितरगण वर्षभर प्रसन्न रहते हैं।   श्राद्ध-कर्म से व्यक्ति केवल अपने सगे-सम्बन्धियों को ही नहीं, बल्कि ब्रह्मा से लेकर तृणपर्यन्त सभी प्राणियों व जगत को तृप्त करता है। पितरों की पूजा को साक्षात् विष्णुपूजा ही माना गया है।   श्राद्ध की वस्तुएं पितरों को कैसे मिलती हैं?   प्राय: कुछ लोग यह शंका करते हैं कि श्राद्ध में समर्पित की गईं वस्तुएं पितरों को कैसे मिलती है? कर्मों की भिन्नता के कारण मरने के बाद गतियां भी भिन्न-भिन्न होती हैं–कोई देवता, कोई पितर, कोई प्रेत, कोई हाथी, कोई चींटी, कोई वृक्ष और कोई तृण बन जाता है। तब मन में यह शंका होती है कि छोटे से पिण्ड से अलग-अलग योनियों में पितरों को तृप्ति कैसे मिलती है? इस शंका का स्कन्दपुराण में बहुत सुन्दर...

लक्ष्मीजी ने गोमय को क्यों चुना अपना निवास-स्थान ?????

 लक्ष्मीजी ने गोमय को क्यों चुना अपना निवास-स्थान ????? ऊँ नमो गोभ्य: श्रीमतीभ्य: सौरभेयीभ्य एव च। नमो ब्रह्मसुताभ्यश्वच पवित्राभ्यो नमो नम:।। अर्थात्—गौ को नमस्कार है, श्रीमती को नमस्कार है, सुरभि देवी को नमस्कार है, ब्रह्मसुता को नमस्कार है और परम पवित्र गौ को नमस्कार है । गाय सच्ची श्रीस्वरूपा (श्रीमती)!!!!!! इस श्लोक में गाय को श्रीमती कहा गया है क्योंकि सभी प्राणियों की विष्ठा अत्यन्त गन्दी और घृणित होती है और लक्ष्मीजी को चंचला कहा जाता है, वह लाख प्रयत्न करने पर भी स्थिर नहीं रहतीं किन्तु गौओं के गोमय (गोबर) में लक्ष्मीजी का शाश्वत निवास है इसलिए गौ को सच्ची श्रीमती कहा गया है ।  सच्ची श्रीमती का अर्थ है कि गोसेवा से जो श्री प्राप्त होती है उसमें सद्-बुद्धि, सरस्वती, समस्त मंगल, सभी सद्-गुण, सभी ऐश्वर्य, परस्पर सौहार्द्र, सौजन्य, कीर्ति, लज्जा और शान्ति–इन सबका समावेश रहता है । शास्त्रों में वर्णित है कि स्वप्न में काली, उजली या किसी भी वर्ण की गाय का दर्शन हो जाए तो मनुष्य के समस्त कष्ट नष्ट हो जाते हैं फिर प्रत्यक्ष गोभक्ति के चमत्कार का क्या कहना ?    ...
 मित्रो आज गुरुवार है, गुरुमहाराज जी का दिन है, पहले गुरुमहाराज जी की वंदना करेगें,तत्पश्चात आपको गुरु जैसी बात बताने का प्रयास करूंगा!!!!!! *श्री गुर पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिब्य दृष्टि हियँ होती॥ दलन मोह तम सो सप्रकासू। बड़े भाग उर आवइ जासू॥ भावार्थ:-श्री गुरु महाराज के चरण-नखों की ज्योति मणियों के प्रकाश के समान है, जिसके स्मरण करते ही हृदय में दिव्य दृष्टि उत्पन्न हो जाती है। वह प्रकाश अज्ञान रूपी अन्धकार का नाश करने वाला है, वह जिसके हृदय में आ जाता है, उसके बड़े भाग्य हैं॥ मित्रो, महापुरुष पाप को छोड़ने में ऊर्जा नहीं लगाते वे केवल जाग जाते हैं, कोई भी बुरा काम करने के लिये आपका बेहोश होना आवश्यक ही है, क्रोध आने पर बेहोश हो जाते हैं और होश में आने पर प्रायश्चित करते हैं, अरे राम राम! मैने ये क्या कर दिया? फिर माफियाँ माँगते हैं, भौतिक भोजन के अलावा जो हम पाँचों इन्द्रियों से लेते हैं वो भी आहार ही है जैसे आँख से हम रूप लेते हैं, कान से ध्वनि तथा हाथों से स्पर्श करते हैं, ये सब इनके आहार हैं। अगर ये भी सम्यक हो तो ध्यान की गति अद्भुत हो जायेगी, आँख से वही देखें जो देखने योग...

नन्दबाबा जिनके आंगन में खेलते हैं परमात्मा!!!!!!!!

 नन्दबाबा जिनके आंगन में खेलते हैं परमात्मा!!!!!!!! जो सभी को आनन्द देते हैं, वह हैं नन्द । नन्दबाबा सभी को चाहते हैं और सबका बहुत ध्यान रखते हैं; इसीलिए उनको सभी का आशीर्वाद मिलता है और परमात्मा श्रीकृष्ण उनके घर पधारते हैं । नन्दबाबा के सौभाग्य को दर्शाने वाला एक सुन्दर श्लोक है— श्रुतिमपरे स्मृतिमपरे भारतमन्ये भजन्तु भवभीता: । अहमिह नन्दं वन्दे यस्यालिन्दे परब्रह्म ।। अर्थात्—संसार से भयभीत होकर कोई श्रुति (वेद) का आश्रय ले, तो दूसरा स्मृति (उपनिषदों) की शरण ग्रहण करे तो कोई तीसरा महाभारत (ग्रन्थ) की शरण में जाए; परन्तु हम तो नन्दबाबा की चरण-वन्दना करते हैं, जिनके आंगन में साक्षात् परब्रह्म श्रीकृष्ण खेलते हैं । नन्दबाबा है श्रीकृष्ण के नित्य सिद्ध पिता गोलोक में नन्दबाबा भगवान श्रीकृष्ण के नित्य पिता हैं और भगवान के साथ ही निवास करते हैं । जब भगवान ने व्रजमण्डल को अपनी लीला भूमि बनाया तब गोप, गोपियां, गौएं और पूरा व्रजमण्डल नन्दबाबा के साथ पहले ही पृथ्वी पर प्रकट हो गया ।  भगवान के नित्य-जन जब पृथ्वी पर पधारते हैं तो कोई-न-कोई प्राणी जो उनका अंश रूप होता है, उनसे एकाकार ह...

प्रेम की आंख और द्वेष की आंख!!!!!!

 प्रेम की आंख और द्वेष की आंख!!!!!! मनुष्य के जीवन के दो प्रमुख पहलू हैं—प्रेम और द्वेष । प्रेम से उसका जीवन कैसे स्वर्ग या आनन्दमय हो जाता है और द्वेष से उसका जीवन कितना नरकमय हो जाता है—इसी बात को स्पष्ट करती महाभारत की कथा । जितना ही मनुष्य दूसरों से प्रेम करेगा, उनसे जुड़ता जाएगा; उतना ही वह सुखी रहेगा । जितना ही दूसरों को द्वेष-दृष्टि से देखोगे, उनसे कटते जाओगे उतने ही दु:खी होओगे । जुड़ना ही आनन्द है और कटना ही दु:ख है मित्रता या प्रेम की आंख से पृथ्वी स्वर्ग बनती है और द्वेष की आंख से नरक का जन्म होता है । संसार में व्यवहार करने के दो तरीके हैं—१. प्रेम या मित्र की दृष्टि से, और २. द्वेष की दृष्टि से । वेद में कहा गया है—‘मनुष्य को संसार को मित्र की दृष्टि से देखना चाहिए । इस संसार में कोई पराया नहीं है, जो हैं सब अपने हैं।’ जितना ही मनुष्य दूसरों से प्रेम करेगा, उनसे जुड़ता जाएगा; उतना ही वह सुखी रहेगा । जितना ही दूसरों को द्वेष-दृष्टि से देखोगे, उनसे कटते जाओगे, उतने ही दु:खी होओगे । जुड़ना ही आनन्द है और कटना ही दु:ख है। मित्रता या प्रेम की आंख से पृथ्वी स्वर्ग बनती है और...

पितृ -दोष शांति के सरल उपाय पितृ या पितृ गण कौन हैं ?आपकी जिज्ञासा को शांत करती विस्तृत प्रस्तुति।

पितरों के लिए महत्वपूर्ण जानकारी आप सभी के बीच रखने का प्रयास कर रहा हूँ ।इसे पूरा अवश्य पढ़े क्योंकि पढ़ने से भी पितरों को शांति मिलती है पूर्णिमा श्राद्ध - 1  प्रतिपदा श्राद्ध -  2  द्वितीया श्राद्ध -   3 तृतीया श्राद्ध-  4  चतुर्थी श्राद्ध- 5  पंचमी श्राद्ध-  6 षष्ठी श्राद्ध 7 सप्तमी श्राद्ध-  8 अष्टमी श्राद्ध 9 नवमी श्राद्ध-  10  दशमी श्राद्ध-  11  एकादशी श्राद्ध-  12  द्वादशी श्राद्ध-  13  त्रयोदशी श्राद्ध-  14  चतुर्दशी श्राद्ध-  15  सर्वपितृ अमावस श्राद्ध  घर के प्रेत या पितर रुष्ट होने के लक्षण और उपाय ---------------------------------- बहुत जिज्ञासा होती है आखिर ये पितृदोष है क्या? पितृ -दोष शांति के सरल उपाय पितृ या पितृ गण कौन हैं ?आपकी जिज्ञासा को शांत करती विस्तृत प्रस्तुति। पितृ गण हमारे पूर्वज हैं जिनका ऋण हमारे ऊपर है ,क्योंकि उन्होंने कोई ना कोई उपकार हमारे जीवन के लिए किया है मनुष्य लोक से ऊपर पितृ लोक है,पितृ लोक के ऊपर सूर्य लोक है एवं इस से भी ऊपर स्वर्...

भगवान विष्णु का हंस अवतार!!!!!!

 भगवान विष्णु का हंस अवतार!!!!!! भगवान विष्णु के चौबीस अवतारों में बीसवां ‘हंस अवतार’ है। श्रीमद्भागवत के एकादश स्कन्ध के तेरहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने उद्धवजी को अपने ‘हंसावतार’ की कथा सुनाई है। भगवान के हंसावतार की सम्पूर्ण जानकारी। भगवान विष्णु के चौबीस अवतारों में बीसवां ‘हंस अवतार’ है; इसीलिए ‘विष्णु सहस्त्रनाम’ में भगवान का एक नाम ‘हंस:’ कहा गया है।  श्रीमद्भागवत के एकादश स्कन्ध के तेरहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने उद्धवजी को अपने ‘हंसावतार’ की कथा सुनाई है। भगवान के हंस अवतार की कथा!!!!!!! एक बार लोकपितामह ब्रह्माजी अपनी दिव्य सभा में बैठे थे । तभी उनके मानस पुत्र सनकादि चारों कुमार दिगम्बर वेष में वहां आए और पिता को प्रणाम कर उनकी आज्ञा लेकर आसनों पर बैठ गए । उन अत्यंत तेजस्वी चारों कुमारों को देखकर सभा में उपस्थित जन मौन हो गए। सनकादि कुमारों ने अपने पिता ब्रह्माजी से प्रश्न किया— ‘पिताजी ! शब्द, स्पर्श आदि विषय (सांसारिक भोग) मन में प्रवेश करते हैं या मन विषयों में प्रवेश करता है; इनका परस्पर आकर्षण है । इस मन को विषयों से अलग कैसे करें ?’ मोक्ष चाहने वाल...

अनंत चतुर्दशी का व्रत

 मित्रों,आज भाद्रपद शुक्लपक्ष की चतुर्दशी हैं और आज के दिन को ही अनंत चतुर्दशी कहा जाता है, आज चतुर्दशी के दिन भगवान गणेशजी की विदाई भी की जाती है, आज के दिन अनंत चतुर्दशी का व्रत भी रखा जाता है और अनंत भगवान् श्रीहरि की पूजा की जाती है, ऐसी मान्यता है कि अनंत भगवान की पूजा करने और व्रत रखने से हमारे सभी कष्ट दूर होते हैं, इसलिये संकटों से सबकी रक्षा करने वाला अनंतसूत्र बांधा जाता है, इससे सभी कष्टों का निवारण होता है।  कहा जाता है कि जब पाण्डव जुयें में अपना सारा राज-पाट हारकर वन में कष्ट भोग रहे थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें अनंत चतुर्दशी का व्रत करने की सलाह दी थी, धर्मराज युधिष्ठिर ने अपने भाइयों तथा द्रौपदी के साथ पूरे विधि-विधान से यह व्रत किया और अनन्त सूत्र धारण किया, इस व्रत का इतना प्रभाव था कि पाण्डव सभी संकटों से मुक्त हो गयें। सज्जनों! अनंत चतुर्दशी कुछ इस प्रकार है- प्राचीन काल में सुमंत नाम का एक नेक तपस्वी ब्राह्मण था, उसकी पत्नी का नाम दीक्षा था, उसकी एक परम सुंदरी धर्मपरायण तथा ज्योतिर्मयी कन्या थी, जिसका नाम सुशीला था, सुशीला जब बड़ी हुई तो उसकी माता दीक्...

आज शनिवार है, शानिमहाराज जी का दिन है। आज हम आपको बतायेंगे,राजा नल को कैसे मिली शनि पीड़ा से मुक्ति ?

 मित्रो आज शनिवार है, शानिमहाराज जी का दिन है। आज हम आपको बतायेंगे,राजा नल को कैसे मिली शनि पीड़ा से मुक्ति ? नवग्रहों में शनि को दण्डनायक व कर्मफलदाता का पद दिया गया है । यदि कोई अपराध या गलती करता है तो उनके कर्मानुसार दण्ड का निर्णय शनिदेव करते हैं । वे अकारण ही किसी को परेशान नहीं करते हैं, बल्कि सबको उनके कर्मानुसार ही दण्ड का निर्णय करते हैं और इस तरह प्रकृति में संतुलन पैदा करते हैं ।  एक बार जब विष्णुप्रिया लक्ष्मी ने शनिदेव से पूछा कि ‘तुम क्यों जातकों की धन हानि करते हो, क्यों सभी तुम्हारे प्रभाव से प्रताड़ित रहते हैं ?’  शनिदेव ने उत्तर दिया—‘उसमे मेरा कोई दोष नही है, परमपिता परमात्मा ने मुझे तीनो लोकों का न्यायाधीश नियुक्त किया हुआ है, इसलिये जो भी तीनो लोकों के अंदर अन्याय करता है, उसे दंड देना मेरा काम है ।’ जिस किसी ने भी शनि की दृष्टि में अपराध किया है, उनको ही शनि ने दंड दिया, चाहे वह भगवान शिव की अर्धांगिनी सती ही क्यों न हों !  शनिदेव की दृष्टि में जुआ खेलना (द्यूतक्रीड़ा) महाअपराध है इसीलिए राजा नल भी शनि प्रकोप से त्रस्त हुए और कैसे उन्हें शनिदेव...

विश्वमोहिनी का स्वयंवर, शिवगणों को तथा भगवान्‌ को शाप और नारद का मोहभंग

 श्री रामचरितमानस बालकांड 31 अध्याय।                   विश्वमोहिनी का स्वयंवर, शिवगणों को तथा भगवान्‌ को शाप और नारद का मोहभंग 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏दोहा :        *आनि देखाई नारदहि भूपति राजकुमारि। कहहु नाथ गुन दोष सब एहि के हृदयँ बिचारि॥130॥ भावार्थ:-(फिर) राजा ने राजकुमारी को लाकर नारदजी को दिखलाया (और पूछा कि-) हे नाथ! आप अपने हृदय में विचार कर इसके सब गुण-दोष कहिए॥130॥ चौपाई : *देखि रूप मुनि बिरति बिसारी। बड़ी बार लगि रहे निहारी॥ लच्छन तासु बिलोकि भुलाने। हृदयँ हरष नहिं प्रगट बखाने॥1॥ भावार्थ:-उसके रूप को देखकर मुनि वैराग्य भूल गए और बड़ी देर तक उसकी ओर देखते ही रह गए। उसके लक्षण देखकर मुनि अपने आपको भी भूल गए और हृदय में हर्षित हुए, पर प्रकट रूप में उन लक्षणों को नहीं कहा॥1॥ *जो एहि बरइ अमर सोइ होई। समरभूमि तेहि जीत न कोई॥ सेवहिं सकल चराचर ताही। बरइ सीलनिधि कन्या जाही॥2॥ भावार्थ:-(लक्षणों को सोचकर वे मन में कहने लगे कि) जो इसे ब्याहेगा, वह अमर हो जाएगा और रणभूमि में कोई उसे जीत न सकेगा। यह शीलनिधि की कन्...