मां ब्रह्मचारिणी देवी दुर्गा के नौ रूपों में से दूसरा रूप हैं। नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है।

 मां ब्रह्मचारिणी देवी दुर्गा के नौ रूपों में से दूसरा रूप हैं। नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। मां ब्रह्मचारिणी का अर्थ: "ब्रह्म" का अर्थ है "तपस्या" और "चारिणी" का अर्थ है "जो तपस्या करती है"। मां ब्रह्मचारिणी को तपस्या और संयम की देवी माना जाता है। मां ब्रह्मचारिणी की कथा: मां ब्रह्मचारिणी ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठिन तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया कि वे उनकी पत्नी बनेंगी। मां ब्रह्मचारिणी की विशेषताएं: - मां ब्रह्मचारिणी को शक्ति और संयम की देवी माना जाता है। - वे अपने भक्तों को तपस्या और संयम की शक्ति प्रदान करती हैं। - मां ब्रह्मचारिणी की पूजा से व्यक्ति को आध्यात्मिक ज्ञान और शक्ति प्राप्त होती है। मां ब्रह्मचारिणी की पूजा: नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। इस दिन विशेष रूप से मां ब्रह्मचारिणी की आराधना की जाती है और उन्हें फूल, फल और अन्य चीजें चढ़ाई जाती हैं।

 मित्रो आज गुरुवार है, गुरुमहाराज जी का दिन है, पहले गुरुमहाराज जी की वंदना करेगें,तत्पश्चात आपको गुरु जैसी बात बताने का प्रयास करूंगा!!!!!!


*श्री गुर पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिब्य दृष्टि हियँ होती॥

दलन मोह तम सो सप्रकासू। बड़े भाग उर आवइ जासू॥


भावार्थ:-श्री गुरु महाराज के चरण-नखों की ज्योति मणियों के प्रकाश के समान है, जिसके स्मरण करते ही हृदय में दिव्य दृष्टि उत्पन्न हो जाती है। वह प्रकाश अज्ञान रूपी अन्धकार का नाश करने वाला है, वह जिसके हृदय में आ जाता है, उसके बड़े भाग्य हैं॥


मित्रो, महापुरुष पाप को छोड़ने में ऊर्जा नहीं लगाते वे केवल जाग जाते हैं, कोई भी बुरा काम करने के लिये आपका बेहोश होना आवश्यक ही है, क्रोध आने पर बेहोश हो जाते हैं और होश में आने पर प्रायश्चित करते हैं, अरे राम राम! मैने ये क्या कर दिया? फिर माफियाँ माँगते हैं, भौतिक भोजन के अलावा जो हम पाँचों इन्द्रियों से लेते हैं वो भी आहार ही है जैसे आँख से हम रूप लेते हैं, कान से ध्वनि तथा हाथों से स्पर्श करते हैं, ये सब इनके आहार हैं।


अगर ये भी सम्यक हो तो ध्यान की गति अद्भुत हो जायेगी, आँख से वही देखें जो देखने योग्य है, कान से वही सुने जो सुनने योग्य है, तो फिर शान्ति के लिये कहीं घर से बाहर जाने की आवश्यकता नही पडेगी, जैसे इधर उधर का खाना खाने से पेट में उथल-पुथल होती है ऐसे ही इधर उधर के विचारों से मन में उथल पुथल होती है, हर आदमी एक दूसरे के कान में कचरा डाल रहा है।


हमने अखबार से पढ़कर कचरा अपने दिमाग में डाल लिया फिर दिन भर ये कचरा दूसरों को दे रहे हैं, आफिस में, पडोस मित्रो में कचरा डाल रहे हैं, अरे भाई! सुनने की भी एक क्षमता होती है, ये वाला आहार भी हमारे भीतर बेचैनी पैदा करता है, ये भीतर की शक्ति को वास्तव में क्षीण कर देता है, अखबार में जो छपा, टीवी में जो देखा इनमें नब्बे प्रतिशत तो वही है जो अगर हम नही भी जानते तो भी कोई हर्ज नही होता।


सुबह सबसे पहले दुनियाँ के समाचारों का भोजन टीवी पर करते हैं, फिर भैंसो की तरह दिन भर उसकी जुगाली करते हैं, प्रातः काल उठकर शान्त चित्त से प्रभु का स्मरण करते है तो दिन कितना अच्छा निकलता, कहाँ जेब कट गयी? कहाँ बस को ट्रक ने टक्कर मारी? कहाँ बारात बैरंग लौट गयी? कौन किसके साथ भाग गई? बस ये सब कचरा सुबह-सुबह भर लेते हैं और शाम तक मथते रहते हैं।


ये चित्त को व्यर्थ में अशान्ति प्रदान करता है, हाँ अगर सार्थक के लिये अशान्त हो तो समझा जा सकता है, अशान्त तो भक्त भी रहता है लेकिन भगवान के लिये "दूखन लागे नैन" दुखी तो भक्त भी रहता है, भोगी भी जागता है और भक्त भी जागता है, भोगी भोग के लिये तथा भक्त भगवान् के लिये जागता है, अगर हम सब के भीतर ये भक्त वाली अशान्ति पैदा हो जाये या भक्त वाली बैचेनी पैदा हो जाये तो शान्ति से बेहतर है, चैन आ जाये।


सब चैन बिहारी का दर्शन करें, ना किसी के कान में कचरा डालिये न किसी को अपने कान में डालने दीजिये, ये अनैतिक कार्य है, सड़क पर छिलके फेंकने से भी ज्यादा अशिष्ट हैं, हमने देखा है कि यात्रा में लोग पढते जा रहे है क्या लिखा है दीवारों पर, बोर्डो पर, एक चीज देखी तो दूसरे की और उत्सुकता बढती है, अरे भाई! आवश्यकता है तो आँखें खोलिये अन्यथा बन्द रखिये कम से कम उतनी देर के लिये तो गलत आहार नहीं मिलेग, इसलिये भाई-बहनों! सुबह उठते ही भगवान् के दर्शन करों, प्रभु का चिन्तन करों, प्रभु की भक्ति करों, सुन्दरकांड का पाठ करेंगे तो पूरा दिन मंगलमय् हो जाता है।


जय श्री रामजी

जय हनुमानजी

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