मूर्ति में क्यों बसते हैं भगवान?
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मूर्ति में क्यों बसते हैं भगवान?
क्यों भगवान मूर्ति में उपस्थित हो जाते हैं और पत्थर की मूर्ति भगवान बन जाती है ? भगवान के अर्चावतार से सम्बधित एक भक्ति कथा ।
किसी नए काम को शुरू करने से पहले या किसी स्थान पर जाने से पहले यह कहा जाता है कि मंदिर के दर्शन अवश्य करने चाहिए। इसके पीछे मान्यता यह है कि मंदिर के वातावरण में मौजूद सकारात्मक ऊर्जा आपके मस्तिष्क को स्वच्छ और सजीव कर, आपको सही दिशा में सोचने के लिए विवश करे।
भक्तों की उपासना के लिए मूर्ति में बसते हैं भगवान:- अन्तर्यामी रूप से भगवान सबके हृदय में हर समय विद्यमान रहते हैं, सिद्ध, योगी आदि समाधि में भगवान के अन्तर्यामी रूप का दर्शन कर सकते हैं परन्तु सभी लोग इस रूप में भगवान के दर्शन का आनन्द नहीं ले पाते हैं।
भक्त अपने इष्ट का दर्शन कैसे करें? इसलिए भक्तों को दर्शन देने के लिए भगवान ने अर्चावतार धारण किया जो भगवान का सभी के लिए सबसे सुलभ रूप है।
अर्चा का अर्थ है पूजा उपासना; इसके लिए होने वाले अवतार का नाम है अर्चावतार, मूर्तियों का ही दूसरा नाम अर्चावतार है।
घर में, मन्दिरों में, तीर्थस्थानों पर, गोवर्धन आदि पर्वतों पर प्रतिष्ठित भगवान की मूर्तियां अर्चावतार कहलाती हैं।
श्रीएकनाथजी ने कहा है:- ‘मी तेचि माझी प्रतिमा, तेथें नाहीं आन धर्मा'
अर्थात् "मैं जो हूँ, वही मेरी प्रतिमा है, प्रतिमा में कोई अन्य धर्म नहीं है।"
चार प्रकार के अर्चावतार:-
(1) भगवान की कुछ मूर्तियां स्वयं प्रकट होती हैं, ये ‘स्वयंव्यक्त’, ‘स्वयंभू’ या ‘स्वत:सम्भूत’ कहलाती हैं। स्वत:सम्भूत मूर्तियां यों ही नहीं मिल जाती; ये उपासकों के लिए ही प्रादुर्भूत होती हैं, अत: इनकी उपासना शीघ्र ही सिद्ध हो जाती है, जहां ये प्रकट होती हैं, वे स्थान तीर्थस्थल हो जाते हैं।
(2) कुछ मूर्तियां देवताओं द्वारा प्रतिष्ठित की गयी होती हैं, वे ‘दैव’ मूर्तियां कहलाती हैं।
(3) कुछ मूर्तियां सिद्धों द्वारा स्थापित की गयी होती हैं, वे ‘सैद्ध’ मूर्तियां कहलाती हैं।
(4) अधिकांशत: मूर्तियां भक्तों, मनुष्यों द्वारा स्थापित होती हैं, वे ‘मानुष’ कहलाती हैं।
मूर्ति कैसे भगवान हो जाती है या भगवान कैसे प्रतिमा में उपस्थित हो जाते हैं?:-
ब्रह्म भले ही निर्गुण हो पर उपासना के लिए वह सगुण हो जाता है और वह आकार विशेष ग्रहण करता है।
जैसे भगवान विष्णु सर्वव्यापक हैं फिर भी उनकी उपलब्धि (संनिधि) शालग्रामजी में होती है।
यदि शालिग्रामजी पर एकटक दृष्टि रखकर प्राण की गति के साथ ॐ का जप और भगवान का ध्यान किया जाए तो उपासक इसी में भगवान की झांकी पा सकते हैं।
हयशीर्षसंहिता में कहा गया है:- ‘उपासक के तप से, अत्यधिक पूजन से और इष्ट से प्रतिमा की एकरूपता से मूर्ति में भगवान उपस्थित हो जाते हैं।’
भगवान रामानुज ने कहा है कि ‘भक्तिरूप आराधना भगवान को प्रत्यक्ष कर देती है।’
व्रज में अनेक स्थल हैं जहां उपासकों ने अपनी उपासना के बल से भगवान को स्वयं प्रकट किया है।
परम उपासक श्रीकल्याणदेवजी ने अपनी उपासना के बल से श्रीबलदाऊजी को, स्वामी हरिदासजी ने श्रीबांकेबिहारीजी को और श्रीगोपालभट्टजी ने श्रीराधारमणजी को प्रकट किया, और न जाने ऐसे कितने उदाहरण हैं।
जब भक्त अपनी भक्ति की शक्ति से भगवान को प्रकट करना चाहते हैं, भगवान की मूर्ति उसी समय भगवान हो जाती है। उसमें ज्ञान, शक्ति, बल, ऐश्वर्य, वीर्य और तेज आदि भगवत्ता के छहों गुण विद्यमान हो जाते हैं, भक्त उसे मूर्ति नहीं देखता बल्कि उसे अपना भगवान मानता है।
मीराबाई के लिए द्वारकाधीश की निरी जड़ मूर्ति नहीं थी, स्वयं चिन्मय भगवान थे, मीरा की इच्छामात्र से उन्होंने उसे अपने में लीन कर लिया।
क्या मस्ती है यह हस्ती मिटाने में।
मीरा देखती है गिरधर जहर के प्याले में॥
करमाबाई गोपाल में वात्सल्यभाव रखती थीं और गोपाल ने उन्हें यशोदा माता की तरह मातृभाव से देखा।
करमाबाई की कुटिया में मैया की खिचड़ी का स्वाद उस सर्वेश्वर जगन्नाथ को ऐसा लगा कि वह अपनी आप्तकामता को भूलकर रो-रोकर उसको खिचड़ी के लिए पुकारता।
सांचो प्रेम प्रभु में हो तो, मुरती बोलै काठ की।
जीमो म्हारा श्याम धणी, जिमावे बेटी जाट की॥
एक दिन करमाबाई परमात्मा के आनन्दमय धाम में चली गयीं, उस दिन भगवान बहुत रोए, श्रीजगन्नाथजी के श्रीविग्रह के नयनों से अविरल अश्रुप्रवाह होने लगा।
रात्रि में राजा के स्वप्न में प्रभु बोले:-’आज माँ इस लोक से विदा हो गई, अब मुझे कौन खिचड़ी खिलाएगा?’
सच्चे भाव से मूर्तिपूजन करने से भगवान प्रकट हो जाते हैं, इसका प्रमाण इस कथा में मिलता है:-
एक महात्माजी को अपने एक ब्राह्मण शिष्य के घर कई दिनों तक रहना पड़ा, महात्माजी के पास कुछ शालग्रामजी की मूर्तियां थीं।
ब्राह्मण की छोटी-सी बच्ची नित्य महात्माजी के पास बैठकर उनको पूजा करते हुए देखती थी।
एक दिन उस बच्ची ने महात्माजी से पूछा:-‘आप किसकी पूजा करते हैं?’
महात्माजी ने बच्ची को छोटा समझकर कह दिया कि:- ‘हम सिलपिले भगवान की पूजा करते हैं।’
बच्ची ने पूछा:- ‘सिलपिले भगवान की पूजा करने से क्या होता है?’
महात्माजी ने कहा:-‘सिलपिले भगवान की पूजा करने से मनचाहा फल प्राप्त होता है।’
बच्ची ने कहा:- ‘मुझे भी एक सिलपिले भगवान दे दीजिए, मैं भी आपकी तरह पूजा किया करुंगी।’
भगवान के प्रति बच्ची का अनुराग देखकर महात्माजी ने एक शालिग्राम देकर उसे पूजा करने का तरीका बता दिया।
वह कन्या सच्ची लगन से नित्य अपने ‘सिलपिले भगवान’ का पूजन करने लगी।
अपने इष्टदेव के अनुराग में वह ऐसी रंग गयी कि बिना भोग लगाये वह कुछ खाती-पीती नहीं थी और अपने इष्ट का क्षणभर का वियोग भी उसे असह्य था।
बड़ी होने पर विवाह के समय ससुराल जाते वक्त वह अपने ‘सिलपिले भगवान’ को भी साथ लेती गयी।
दुर्भाग्यवश उसे पति ऐसा मिला जिसे भगवान में विश्वास नहीं था, एक दिन पत्नी को पूजा करते देखकर उसके पति ने मूर्ति को उठा लिया और बोला:-‘इसे मैं नदी में डाल दूंगा।’
कन्या के बहुत अनुनय-विनय करने पर भी पति ने मूर्ति को नदी में फेंक दिया।
उसी समय से कन्या अपने ‘सिलपिले भगवान’ के विरह में दीवानी हो गयी और हर समय यही रट लगाये रहती:-‘मेरे सिलपिले भगवन, मुझ दासी को छोड़कर कहां चले गए, शीघ्र दर्शन दो; आपका वियोग असह्य है।’
एक दिन वह भगवान के विरह में पागल होकर उसी नदी के किनारे पहुंच गयी और ऊंचे स्वर में अपने प्रभु को पुकार कर कहने लगी:- ‘शीघ्र आकर दर्शन दो, नहीं तो दासी का प्राणान्त होने जा रहा है।’
इस करुण पुकार के साथ ही एक अद्भुत स्वर गूंजा:- ‘मैं आ रहा हूं ’ उसी समय उस कन्या के समक्ष वही शालिग्रामजी की मूर्ति प्रकट हो गयी।
जैसे ही वह शालिग्रामजी को हृदय से लगाने लगी, उस मूर्ति के अंदर से चतुर्भुजरूप में भगवान प्रकट हो गए, भगवान के दिव्य तेज से अन्य सभी लोगों की आंखें बंद हो गयीं।
तभी एक दिव्य गरुणध्वज विमान आया और भगवान अपनी उस सच्ची भक्ता को विमान में बिठलाकर वैकुण्ठलोक को चले गए और भगवान से विमुख उसका पति आंखें फाड़ कर देखता रह गया।
मूर्तिपूजा की महिमा:- अग्निपुराण में कहा गया है:- ‘यमराज का यमदूतों को निर्देश है कि वे मूर्ति की पूजा करने वालों को नरक नहीं लायें।
श्रीएकनाथजी का कहना है:- कलियुग में मूर्ति (प्रतिमा) पूजा से बढ़कर भक्ति का और कोई साधन नहीं है।
[9/7, 12:32 PM] +91 78983 30143: श्राद्ध में अर्पित सामग्री पितरों को कैसे मिलती है?
‘श्रद्धया दीयते यत् तत् श्राद्धम्।’
‘श्राद्ध’ का अर्थ है श्रद्धा से जो कुछ दिया जाए। पितरों के लिए श्रद्धापूर्वक किए गए पदार्थ-दान (हविष्यान्न, तिल, कुश, जल के दान) का नाम ही श्राद्ध है। श्राद्धकर्म पितृऋण चुकाने का सरल व सहज मार्ग है। पितृपक्ष में श्राद्ध करने से पितरगण वर्षभर प्रसन्न रहते हैं।
श्राद्ध-कर्म से व्यक्ति केवल अपने सगे-सम्बन्धियों को ही नहीं, बल्कि ब्रह्मा से लेकर तृणपर्यन्त सभी प्राणियों व जगत को तृप्त करता है। पितरों की पूजा को साक्षात् विष्णुपूजा ही माना गया है।
श्राद्ध की वस्तुएं पितरों को कैसे मिलती हैं?
प्राय: कुछ लोग यह शंका करते हैं कि श्राद्ध में समर्पित की गईं वस्तुएं पितरों को कैसे मिलती है? कर्मों की भिन्नता के कारण मरने के बाद गतियां भी भिन्न-भिन्न होती हैं–कोई देवता, कोई पितर, कोई प्रेत, कोई हाथी, कोई चींटी, कोई वृक्ष और कोई तृण बन जाता है। तब मन में यह शंका होती है कि छोटे से पिण्ड से अलग-अलग योनियों में पितरों को तृप्ति कैसे मिलती है? इस शंका का स्कन्दपुराण में बहुत सुन्दर समाधान मिलता है।
एक बार राजा करन्धम ने महायोगी महाकाल से पूछा 'मनुष्यों द्वारा पितरों के लिए जो तर्पण या पिण्डदान किया जाता है तो वह जल, पिण्ड आदि तो यहीं रह जाता है फिर पितरों के पास वे वस्तुएं कैसे पहुंचती हैं और कैसे पितरों को तृप्ति होती है?’
भगवान महाकाल ने बताया कि–विश्व नियन्ता ने ऐसी व्यवस्था कर रखी है कि श्राद्ध की सामग्री उनके अनुरुप होकर पितरों के पास पहुंचती है। इस व्यवस्था के अधिपति हैं अग्निष्वात आदि। पितरों और देवताओं की योनि ऐसी है कि वे दूर से कही हुई बातें सुन लेते हैं, दूर की पूजा ग्रहण कर लेते हैं और दूर से कही गयी स्तुतियों से ही प्रसन्न हो जाते हैं।
वे भूत, भविष्य व वर्तमान सब जानते हैं और सभी जगह पहुंच सकते हैं। पांच तन्मात्राएं, मन, बुद्धि, अहंकार और प्रकृति–इन नौ तत्वों से उनका शरीर बना होता है और इसके भीतर दसवें तत्व के रूप में साक्षात् भगवान पुरुषोत्तम उसमें निवास करते हैं। इसलिए देवता और पितर गन्ध व रसतत्व से तृप्त होते हैं। शब्दतत्व से रहते हैं और स्पर्शतत्व को ग्रहण करते हैं। पवित्रता से ही वे प्रसन्न होते हैं और वर देते हैं।
जैसे मनुष्यों का आहार अन्न है, पशुओं का आहार तृण है, वैसे ही पितरों का आहार अन्न का सार-तत्व (गंध और रस) है। अत: वे अन्न व जल का सारतत्व ही ग्रहण करते हैं। शेष जो स्थूल वस्तु है, वह यहीं रह जाती है।
किस रूप में पहुंचता है पितरों को आहार ?
नाम व गोत्र के उच्चारण के साथ जो अन्न-जल आदि पितरों को दिया जाता है, विश्वेदेव एवं अग्निष्वात (दिव्य पितर) हव्य-कव्य को पितरों तक पहुंचा देते हैं। यदि पितर देवयोनि को प्राप्त हुए हैं तो यहां दिया गया अन्न उन्हें ‘अमृत’ होकर प्राप्त होता है। यदि गन्धर्व बन गए हैं तो वह अन्न उन्हें भोगों के रूप में प्राप्त होता है। यदि पशुयोनि में हैं तो वह अन्न तृण के रूप में प्राप्त होता है। नागयोनि में वायुरूप से, यक्षयोनि में पानरूप से, राक्षसयोनि में आमिषरूप में, दानवयोनि में मांसरूप में, प्रेतयोनि में रुधिररूप में और मनुष्य बन जाने पर भोगने योग्य तृप्तिकारक पदार्थों के रूप में प्राप्त होता हैं।
जिस प्रकार बछड़ा झुण्ड में अपनी मां को ढूंढ़ ही लेता है, उसी प्रकार नाम, गोत्र, हृदय की भक्ति एवं देश-काल आदि के सहारे दिए गए पदार्थों को मन्त्र पितरों के पास पहुंचा देते हैं। जीव चाहें सैकड़ों योनियों को भी पार क्यों न कर गया हो, तृप्ति तो उसके पास पहुंच ही जाती है।
श्रीराम द्वारा श्राद्ध में आमन्त्रित ब्राह्मणों में सीताजी ने किए राजा दशरथ व पितरों के दर्शन!!!!!!!
श्राद्ध में आमन्त्रित ब्राह्मण पितरों के प्रतिनिधिरूप होते हैं। एक बार पुष्कर में श्रीरामजी अपने पिता दशरथजी का श्राद्ध कर रहे थे। रामजी जब ब्राह्मणों को भोजन कराने लगे तो सीताजी वृक्ष की ओट में खड़ी हो गयीं। ब्राह्मण-भोजन के बाद रामजी ने जब सीताजी से इसका कारण पूछा तो वे बोलीं–
‘मैंने जो आश्चर्य देखा, उसे आपको बताती हूँ। आपने जब नाम-गोत्र का उच्चारणकर अपने पिता-दादा आदि का आवाहन किया तो वे यहां ब्राह्मणों के शरीर में छायारूप में सटकर उपस्थित थे। ब्राह्मणों के शरीर में मुझे अपने श्वसुर आदि पितृगण दिखाई दिए फिर भला मैं मर्यादा का उल्लंघन कर वहां कैसे खड़ी रहती; इसलिए मैं ओट में हो गई।
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