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Showing posts from June, 2022

मां ब्रह्मचारिणी देवी दुर्गा के नौ रूपों में से दूसरा रूप हैं। नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है।

 मां ब्रह्मचारिणी देवी दुर्गा के नौ रूपों में से दूसरा रूप हैं। नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। मां ब्रह्मचारिणी का अर्थ: "ब्रह्म" का अर्थ है "तपस्या" और "चारिणी" का अर्थ है "जो तपस्या करती है"। मां ब्रह्मचारिणी को तपस्या और संयम की देवी माना जाता है। मां ब्रह्मचारिणी की कथा: मां ब्रह्मचारिणी ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठिन तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया कि वे उनकी पत्नी बनेंगी। मां ब्रह्मचारिणी की विशेषताएं: - मां ब्रह्मचारिणी को शक्ति और संयम की देवी माना जाता है। - वे अपने भक्तों को तपस्या और संयम की शक्ति प्रदान करती हैं। - मां ब्रह्मचारिणी की पूजा से व्यक्ति को आध्यात्मिक ज्ञान और शक्ति प्राप्त होती है। मां ब्रह्मचारिणी की पूजा: नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। इस दिन विशेष रूप से मां ब्रह्मचारिणी की आराधना की जाती है और उन्हें फूल, फल और अन्य चीजें चढ़ाई जाती हैं।

प्रभुश्रीराम और भगवान शंकर का युद्ध!!!!!!

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 प्रभुश्रीराम और भगवान शंकर का युद्ध!!!!!! आपने कभी सोचा है कि रामजी और शिवजी के बीच युद्ध भी हो सकता है? सभी जानते हैं कि रामजी के आराध्यदेव शिवजी हैं, तब फिर रामजी कैसे शिवजी से युद्ध कर सकते हैं? पुराणों में विदित दृष्टांत के अनुसार यह युद्ध श्रीरामजी के अश्वमेध यज्ञ के दौरान लड़ा गया, यज्ञ का अश्व कई राज्यों को श्रीरामजी की सत्ता के अधीन किये जा रहे थें, इसी बीच यज्ञ का अश्व देवपुर पहुंचा, जहां राजा वीरमणि का राज्य था।  वीरमणि ने भगवान् शंकरजी की तपस्या कर उनसे उनकी और उनके पूरे राज्य की रक्षा का वरदान मांगा था, महादेवजी के द्वारा रक्षित होने के कारण कोई भी उनके राज्य पर आक्रमण करने का साहस नहीं करता था, जब यज्ञ का घोड़ा उनके राज्य में पहुंचा तो राजा वीरमणि के पुत्र रुक्मांगद ने उसे बंदी बना लिया, ऐसे में अयोध्या और देवपुर के बीच युद्ध होना तय था।  भगवान् शिवजी ने अपने भक्त को मुसीबत में जानकर वीरभद्र के नेतृत्व में नंदी, भृंगी सहित अपने सारे गणों को भेज दिया, एक और रामजी की सेना तो दूसरी ओर शिवजी की सेना थी, वीरभद्र ने एक त्रिशूल से रामजी की सेना के पुष्कल का मस्तक क...

मन की कलुषता को दूर कर आनन्द और मोक्ष प्रदान करने वाला,श्रीगोविन्द दामोदर स्तोत्र एवं भक्त बिल्वमंगल!!!!!!

 मन की कलुषता को दूर कर आनन्द और मोक्ष प्रदान करने वाला,श्रीगोविन्द दामोदर स्तोत्र एवं भक्त बिल्वमंगल!!!!!! कल्पवृक्ष सम है सदा करुणामय हरिनाम। चाह किये देता मुकति, प्रेम किये व्रजधाम।। भगवान का नाम कितना पावन है, उसमें कितनी शान्ति, कैसी शक्ति और कितनी कामप्रदता है, यह कोई नहीं बतला सकता। अथाह की थाह कौन ले सकता है। जिसके माहात्म्य का ज्ञान बुद्धि से परे है, उसका वाणी से वर्णन कैसे हो सकता है? एक साधु से किसी ने पूछा–’महाराज! नाम लेने से क्या होता है?’ साधु ने उत्तर दिया–’क्या होता है? नाम से क्या नहीं होता? जिस माया ने जगत् को मोहित कर रखा है, अज्ञानी बना रखा है, नाम के प्रभाव से वह माया भी मोहित हो जाती है, अपना प्रभाव खो देती है। चाहने से कहीं बहुत अधिक प्राप्त होता है। मनुष्य का चाहना-पाना दोनों मिट जाते हैं। श्रीगोविन्द दामोदर स्तोत्रम् की रचना श्रीबिल्वमंगल ठाकुर द्वारा की गयी है जिन्हें ‘श्रीलीलाशुक’ कहा जाता है। यह स्तोत्र ७१ श्लोकों का है किन्तु यहां इसके कुछ प्रचलित श्लोक ही हिन्दी अनुवाद सहित दिए जा रहे हैं। श्रीबिल्वमंगल,परिचय!!!!!!! सदियों पहले बिल्वमंगल नामक ब्राह्मण...

भागवत कथा में बांस की स्थापना क्यों की जाती है?

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 भागवत कथा में बांस की स्थापना क्यों की जाती है? जब महात्मा गोकर्ण जी ने महाप्रेत धुंधुकारी के उद्धार के लिए श्रीमद् भागवत की कथा सुनायी थी, तक धुंधुकारी के बैठने के लिए कोई बांस की अलग से व्यवस्था नहीं की थी । बल्कि उसके बैठने के लिए एक सामान्य आसान ही बिछाया गया था । महात्मा गोकर्ण जी ने धुंधुकारी का आह्वान किया और कहा - "भैया धुंधुकारी ! आप जहाँ कहीं भी हों, आ करके इस आसान पर बैठ जाईये । यह भागवत जी की परम् पवित्र कथा विशेषकर तेरे लिए ही हो रही है । इसको सुनकर तुम इस प्रेत योनि से मुक्त हो जाओगे । अब धुंधुकारी का कोई शरीर तो था नहीं, जो आसन पर स्थिर रहकर भागवत जी की कथा सुन पाते । वह जब जब आसन पर बैठने लगता, हवा का कोई झोंका आता और उसे कहीं दूर उड़ाकर ले जाता । ऐसा उसके साथ बार-बार हुआ । वह सोचने लगा कि ऐसा क्या किया जाये कि मुझे हवा उड़ा ना पाए और मैं सात दिन तक एक स्थान पर बैठकर भागवत जी की मंगलमयी कथा सुन पाऊँ, जिससे मेरा उद्धार हो जाये और मेरी मुक्ति हो जाये । वह सोचने लगा कि मेरे तो अब माता-पिता भी नहीं हैं, जिनके भीतर प्रवेश करके या उनके माध्यम से मैं कथा सुन पाता । वो भी म...

मन, इन्द्रिय और प्राणों में कौन है सबसे श्रेष्ठ?

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 मन, इन्द्रिय और प्राणों में कौन है सबसे श्रेष्ठ? जानें, प्राणों को ब्रह्म क्यों कहा जाता है ? शरीर में पंच प्राण कहां स्थित हैं और क्या है उनका काम ? परमात्मा की सृष्टि में जो क्रियात्मिका (करने की शक्ति) व गत्यात्मिका (चलने या हिलने की) शक्ति है, उसे ही प्राणशक्ति कहते हैं अर्थात् शरीर की चेतना ही ‘प्राण’ हैं।  ‘प्राण’ केवल श्वास (सांस) नहीं है वरन् वह शक्ति या तत्त्व है जिससे श्वास लेने व छोड़ने की समस्त क्रियाएं एक जीवित शरीर में होती हैं। देवता, मनुष्य, पशु आदि प्राण के सहारे ही सांस लेते हैं। जब तक शरीर में नाक के छिद्रों से प्राणवायु का संचार होता रहता है तब तक गूंगा, बहरा, अंधा मनुष्य भी ‘जीवित’ कहा जाता है और जब प्राणवायु का नाक के छिद्रों द्वारा आवागमन समाप्त हो जाता है तब मनुष्य ‘मृत’ मान लिया जाता है। प्राणशक्ति के कारण ही मनुष्य, पशु-पक्षी, कीट-पतंग, वृक्ष-लता एवं पर्वत विकसित होते हैं। जब इनमें प्राणशक्ति नहीं रह जाती तब ये सूखने व सड़ने लगते हैं। मनुष्य व पशुओं में प्राणशक्ति चले जाने के लक्षण तुरन्त प्रकट हो जाते हैं, वृक्षों में कुछ देर में और पत्थरों आदि में ...

मनुष्य जन्म अत्यन्त ही दुर्लभ है,बड़े भाग्य से यह मनुष्य शरीर मिला है। सब ग्रंथों ने यही कहा है

 बड़ें भाग मानुष तनु पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा॥ साधन धाम मोच्छ कर द्वारा। पाइ न जेहिं परलोक सँवारा॥ भावार्थ:-बड़े भाग्य से यह मनुष्य शरीर मिला है। सब ग्रंथों ने यही कहा है कि यह शरीर देवताओं को भी दुर्लभ है (कठिनता से मिलता है)। यह साधन का धाम और मोक्ष का दरवाजा है। इसे पाकर भी जिसने परलोक न बना लिया,॥ मनुष्य जन्म अत्यन्त ही दुर्लभ है, मनुष्य जीवन का केवल एक ही उद्देश्य और एक ही लक्ष्य होता है, वह भगवान की अनन्य-भक्ति प्राप्त करना है। अनन्य-भक्ति को प्राप्त करके मनुष्य सुख और दुखों से मुक्त होकर कभी न समाप्त होने वाले आनन्द को प्राप्त हो जाता है। यहाँ सभी सांसारिक संबंध स्वार्थ से प्रेरित होते हैं।  हमारे पास किसी प्रकार की शक्ति है, धन-सम्पदा है, शारीरिक बल है, किसी प्रकार का पद है, बुद्धि की योग्यता है तो उसी को सभी चाहते है न कि हमको चाहते है। हम भी संसार से किसी न किसी प्रकार की विद्या, धन, योग्यता, कला आदि ही चाहते हैं, संसार को नहीं चाहते हैं। इन बातों से सिद्ध होता है संसार में हमारा कोई नहीं है, सभी किसी न किसी स्वार्थ सिद्धि के लिये ही हम से जुड़े हुए है। सभी...

इस तरह रामचरित मानस बना धर्म शास्त्र!!!!!!!

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 इस तरह रामचरित मानस बना धर्म शास्त्र!!!!!!! * भव सागर चह पार जो पावा। राम कथा ता कहँ दृढ़ नावा॥ बिषइन्ह कहँ पुनि हरि गुन ग्रामा। श्रवन सुखद अरु मन अभिरामा॥ भावार्थ:-जो संसार रूपी सागर का पार पाना चाहता है, उसके लिए तो श्री रामजी की कथा दृढ़ नौका के समान है। श्री हरि के गुणसमूह तो विषयी लोगों के लिए भी कानों को सुख देने वाले और मन को आनंद देने वाले हैं॥ करीब पांच सौ साल पहले तक कोई धर्म ग्रंथ हिंदी में नहीं था। सभी धर्म ग्रंथ संस्कृत में थे और चूंकि मध्य काल में शिक्षा दीक्षा का चलन काफी कम हो गया था, भक्ति भावना या धर्म श्रद्धा के लिए लोग संस्कृत विद्वानों की ओर ही ताकते थे। ऐसा कोई शास्त्र नहीं था, जो लोगों की अपनी भाषा में हो। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस लिख कर एक समाधान दिया था, लोकिन कठिनाई यह थी कि विद्वानों और धर्माचार्यों ने इसे मान्यता नहीं दी। इसलिए धर्म भावना से भरे लोगों के मन में यह फांस अटकी रहती थी कि वे राम कथा से तो प्रेरणा ले रहे हैं लेकिन उनकी जानकारी का जो स्त्रोत है, वह धर्म शास्त्र नहीं है। क्योंकि धर्मशास्त्र तो संस्कृत में ही हो सकता है। पुरानी मान्यता ...

भागवत कथा सात दिन ही क्यों ?..

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 भागवत कथा सात दिन ही क्यों ?.. हम सात दिन की कथा सुनके अपने जीवन के सभी सातो दिनों को पवित्र कर लेते हैं! पाप रहित बनें!  राजा परीक्षित को सात दिन का शाप मिला तो तुरंत अपने पुत्र जनमेजय को  सौंपकर चलपड़े! पर मन में एक प्रश्न है? जीवन में प्रश्नो का होना बहुत महत्वपूर्ण है, अबोध बालक जो कुछ नहीं जनता वह भी एक दिन में न जाने कितने सारे प्रश्न करता है! फिर हम भी तो परमात्मा के विषय में अबोध हैं, कुछ जानते नहीं, हमारे पण्डित जी ने जो कहा उसी के आधार पर हमारी पूजा बढ़ जाती है! तो हमें अपनी पूजा नहीं बढा़नी हमें तो श्रद्धा बढा़नी है, जब तक जानकारी नहीं  होगी, तब तक श्रद्धा भी नहीं बढे़गी! इसलिए परमात्मा की प्रीति के लिए प्रश्न जरूरी है, परन्तु प्रश्न करने से पहले ध्यान दें की हम प्रश्न किससे कर रहे है! और प्रश्न कहां कर रहे हैं! दूसरी बात हम जिनसे प्रश्न करते हैं! उनके प्रती आदर भाव आवश्यक है! महाभारत में जब अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से प्रश्न किया, तो प्रश्न के पहले अर्जुन ने अपने आपको शिष्य माना! इसलिए आप जब शिष्य भाव से प्रश्न करेंगे, तो आपको प्रश्नों के उत्तर अवश्य मि...

सन्तान के रुप में कौन आता है ?*

 पूर्व जन्मों के कर्मों से ही हमें इस जन्म में माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नि, प्रेमी-प्रेमिका, मित्र-शत्रु, सगे-सम्बन्धी इत्यादि संसार के जितने भी रिश्ते नाते हैं, सब मिलते हैं । क्योंकि इन सबको हमें या तो कुछ देना होता है या इनसे कुछ लेना होता है।  *सन्तान के रुप में कौन आता है ?* वेसे ही सन्तान के रुप में हमारा कोई पूर्वजन्म का 'सम्बन्धी' ही आकर जन्म लेता है । जिसे शास्त्रों में चार प्रकार से बताया गया है -- *ऋणानुबन्ध  :* पूर्व जन्म का कोई ऐसा जीव जिससे आपने ऋण लिया हो या उसका किसी भी प्रकार से धन नष्ट किया हो, वह आपके घर में सन्तान बनकर जन्म लेगा और आपका धन बीमारी में या व्यर्थ के कार्यों में तब तक नष्ट करेगा, जब तक उसका हिसाब पूरा ना हो जाये । *शत्रु पुत्र  :* पूर्व जन्म का कोई दुश्मन आपसे बदला लेने के लिये आपके घर में सन्तान बनकर आयेगा और बड़ा होने पर माता-पिता से मारपीट, झगड़ा या उन्हें सारी जिन्दगी किसी भी प्रकार से सताता ही रहेगा । हमेशा कड़वा बोलकर उनकी बेइज्जती करेगा व उन्हें दुःखी रखकर खुश होगा । *उदासीन पुत्र  :* इस प्रकार की सन्तान ना तो माता-पिता ...

श्रीमदभागवत पुराण की एक बहुचर्चित एवम शिक्षाप्रद अजामिल की विस्तृत कथा !!!!!

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 श्रीमदभागवत पुराण की एक बहुचर्चित एवम शिक्षाप्रद अजामिल की विस्तृत कथा !!!!!  शुकदेवजी महाराज राजा परीक्षित से कहते हैं,कि हे प्रिय परीक्षित्! यह कथा परम गोपनीय—अत्यन्त रहस्यमय है। मलय पर्वत पर विराजमान भगवान् अगस्त्यजी ने श्रीहरि की पूजा करते समय मुझे यह सुनाया था,आप भी सुने,,,,,, कान्यकुब्ज (कन्नौज) में एक ब्राम्हण रहता था। उसका नाम अजामिल था। यह अजामिल बड़ा शास्त्रज्ञ था। शील, सदाचार और सद्गुणों का तो यह खजाना ही था। ब्रम्हचारी, विनयी, जितेन्द्रिय, सत्यनिष्ठ, मन्त्रवेत्ता और पवित्र भी था। इसने गुरु, संत-महात्माओं सबकी सेवा की थी। एक बार अपने पिता के आदेशानुसार वन में गया और वहाँ से फल-फूल, समिधा तथा कुश लेकर घर के लिये लौटा। लौटते समय इसने देखा की एक व्यक्ति मदिरा पीकर किसी वेश्या के साथ विहार कर रहा है।  वेश्या भी शराब पीकर मतवाली हो रही है। अजामिल ने पाप किया नहीं केवल आँखों से देखा और काम के वश हो गया । अजामिल ने अपने मन को रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन नाकाम रहा। अब यह मन-ही-मन उसी वेश्या का चिन्तन करने लगा और अपने धर्म से विमुख हो गया । अजामिल सुन्दर-सुन्दर वस्त्र...

राजा दशरथ के मुकुट का एक अनोखा राज, पहले कभी नही सुनी होगी यह कथा आपने !!!!!!!!!!

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 राजा दशरथ के मुकुट का एक अनोखा राज, पहले कभी नही सुनी होगी यह कथा आपने !!!!!!!!!! अयोध्या के राजा दशरथ एक बार भ्रमण करते हुए वन की ओर निकले वहां उनका समाना बाली से हो गया। राजा दशरथ की किसी बात से नाराज हो बाली ने उन्हें युद्ध के लिए चुनोती दी। राजा दशरथ की तीनो रानियों में से कैकयी अश्त्र शस्त्र एवं रथ चालन में पारंगत थी। अतः अक्सर राजा दशरथ जब कभी कही भ्रमण के लिए जाते तो कैकयी को भी अपने साथ ले जाते थे इसलिए कई बार वह युद्ध में राजा दशरथ के साथ होती थी। जब बाली एवं राजा दशरथ के मध्य भयंकर युद्ध चल रहा था उस समय संयोग वश रानी कैकयी भी उनके साथ थी। युद्ध में बाली राजा दशरथ पर भारी पड़ने लगा वह इसलिए क्योकि बाली को यह वरदान प्राप्त था की उसकी दृष्टि यदि किसी पर भी पद जाए तो उसकी आधी शक्ति बाली को प्राप्त हो जाती थी। अतः यह तो निश्चित था की उन दोनों के युद्ध में हर राजा दशरथ की ही होगी। राजा दशरथ के युद्ध हारने पर बाली ने उनके सामने एक शर्त रखी की या तो वे अपनी पत्नी कैकयी को वहां छोड़ जाए या रघुकुल की शान अपना मुकुट यहां पर छोड़ जाए। तब राजा दशरथ को अपना मुकुट वहां छोड़ रानी कैकेयी के...

भगवान कल्कि का अवतार कब, कहाँ, क्यों और कौन होंगे माता-पिता??????

 भगवान कल्कि का अवतार कब, कहाँ, क्यों और कौन होंगे माता-पिता?????? धार्मिक एवं पौराणिक मान्यता के अनुसार जब पृथ्वी पर पाप बहुत अधिक बढ़ जाएगा। तब दुष्टों के संहार के लिए विष्णु का यह अवतार यानी 'कल्कि अवतार' प्रकट होगा। कल्कि को विष्णु का भावी और अंतिम अवतार माना गया है। भगवान का यह अवतार निष्कलंक भगवान के नाम से भी जाना जायेगा। आपको ये जानकर आश्चर्य होगा की भगवान श्री कल्कि 64 कलाओं के पूर्ण निष्कलंक अवतार हैं।  भगवान श्री कल्कि की भक्ति इस समय एक ऐसे कवच के समान है जो हमारी हर प्रकार से रक्षा कर सकती है। भगवान श्री कल्कि की भक्ति व्यक्तिगत न होकर समष्टिगत है। जो भी व्यक्ति भगवान श्री कल्कि की भक्ति करता है, वह चाहता है कि भगवान शीघ्र अवतार धारण कर भूमि का भार हटाएं और दुष्टों का संहार करें। कलियुग यानी कलह-क्लेश का युग, जिस युग में सभी के मन में असंतोष हो, सभी मानसिक रूप से दुखी हों, वह युग ही कलियुग है। हिंदू धर्म ग्रंथों में चार युग बताए गए हैं। सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलयुग। सतयुग में लोगों में छल, कपट और दंभ नहीं होता है।  त्रेतायुग में एक अंश अधर्म अपना पैर ...

पूजा के समय मन्दिर में घंटी क्यों बजाई जाती है ?

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 प्रश्न :- पूजा के समय मन्दिर में घंटी क्यों बजाई जाती है ?  उत्तर :- सनातन/वैदिक संस्कृति के अंतर्गत किया गया कोई भी कार्य अंधविश्वास नहीं है बल्कि प्रमाणित वैज्ञानिक एवं अध्यात्मिक कारण होते हैं i घंटी बजाना, शंख बजाना, संगीत बजाना, आरती करना, चरणामृत/प्रशाद बाँटना,दंडवत करना, धुप अगरबत्ती जलाना, पुजारी द्वारा स्नान करके पवित्र ता के साथ पूजा करना , मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा कराना, मूर्तियों का शृंगार करना,पुजारी या महंत द्वारा उनकी स्थिति के अनुसार चोटी या दाढी-बाल रखना, भजन कीर्तन करना आदि आदि और भी अनेकों क्रियाएं होती हैं जो पूर्णतः प्रमाणित, शास्त्र्वत  एवं वैज्ञानिक होती हैं  i    घंटी बजाने के कारण :- पहला कारण घंटी बजाने से देवताओं के समक्ष आपकी हाजिरी लग जाती है। मान्यता अनुसार घंटी बजाने से मंदिर में स्थापित देवी-देवताओं की मूर्तियों में चेतना जागृत होती है जिसके बाद उनकी पूजा और आराधना अधिक फलदायक और प्रभावशाली बन जाती है।  दूसरा कारण घंटी की मनमोहक एवं कर्णप्रिय ध्वनि मन-मस्तिष्क को अध्यात्म भाव की ओर ले जाने का सामर्थ्य रखती है। मन घं...

चिंतन क्या है ?????

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 चिंतन क्या है ?????? * श्रोता सुमति सुसील सुचि कथा रसिक हरि दास। पाइ उमा अति गोप्यमपि सज्जन करहिं प्रकास॥ भावार्थ:-हे उमा! सुंदर बुद्धि वाले सुशील, पवित्र कथा के प्रेमी और हरि के सेवक श्रोता को पाकर सज्जन अत्यंत गोपनीय (सबके सामने प्रकट न करने योग्य) रहस्य को भी प्रकट कर देते हैं॥ चिंतन का मतलब होता है किसी बात की गहराई में जाना। उसको कई प्रकार से सोचना। यह बात सत्य है कि कर्म की अवधारणा चिंतन पर टिकी है, जब तक हम किसी काम के बारे मे सोचेंगे ही नहीं तो काम क्या करेंगे? और उसे कैसे पूरा करेंगे?  लेकिन कोई काम केवल चिंतन मात्र से भी तो पूरा नहीं होता है, उसे पूरा करने के लिये मन से कर्म समझ कर करना आवश्यक है, बल के साथ यदि दूरी नहीं तय की गई है तो किया हुआ कार्य भी शून्य होगा यानी कि बल का प्रयोग कितना भी क्यों न हो, बस इसी तरह हम मन से खूब सोचें किंतु जब तक कर्मणा अर्थात कार्यरूप मे नहीं जाते तो हमारा कार्य शून्य ही रहेगा। मनसा, वाचा,कर्मणा संस्कृत की यह सूक्ति अपने में कर्म के उत्पत्ति की सारी अवधारणायें छुपाये हुए है, इस कर्मभूमि में घटित होने वाली सारी क्रियाओं का सम्पादन इ...

कैसे किया जगत के कल्याण के लिए भगवान शिव ने ताण्डव नृत्य!!!!!!!!!

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 कैसे किया जगत के कल्याण के लिए भगवान शिव ने ताण्डव नृत्य!!!!!!!!! शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव सुर-ताल के महान ज्ञाता होने से नृत्यकला के प्रवर्तक थे, इसलिए उन्हें ‘आदि नर्तक’ और  ‘नटराज’ कहा जाता है । नटराज शिव द्वारा प्रवर्तित नृत्य के अनेक प्रकार हैं, जिनमें ‘ताण्डव’ (तांडव) सर्वप्रमुख है ।  पार्वतीजी के साथ विवाह के बाद शिव ने अपने शरीर में इसके दो भाग कर दिए—एक है ताण्डव और दूसरा है लास्य । ताण्डव तो शिव का नृत्य है–उद्धत और आकर्षक;  लास्य पार्वतीजी का नृत्य है–सुकुमार तथा मनोहर । ‘ताण्डव’ नृत्य के सम्बन्ध में कहा जाता है कि— ▪️ भगवान शिव ने प्रजापति दक्ष के यज्ञ को नष्ट कर डिंडिम, गोमुख, पणव आदि विभिन्न वाद्यों के संग में संन्ध्याकाल में जो नृत्य किया उसे ही ‘ताण्डव’ कहते हैं ।  ▪️ कहते हैं भगवान शिव ने त्रिपुरदाह के बाद भी उल्लास-नृत्य ताण्डव किया था । भगवान शिव की आज्ञा से उन्हीं के प्रधान गण ‘तण्डु’ ने इन नृत्यों को अभिनय के प्रयोग के लिए भरतमुनि को दिया था । तण्डु मुनि द्वारा प्रचारित यह नृत्य ‘ताण्डव’ नाम से प्रचलित हुआ । शिव के उल्लास-नृत्य में रस औ...

भगवान् श्री शंकर की अद्भुत गौ भक्ति!!!!!

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 भगवान् श्री शंकर की अद्भुत गौ भक्ति!!!!! श्री कृष्ण की लीलाओ में गौ माता का प्रधान स्थान रहा है । भगवान् विष्णु जैसे महान् गौ भक्त है उसी प्रकार श्री शंकर भी महान गौ भक्त है । पुराणों में उपलब्ध भगवान् शिव की गौ भक्ति दर्शाने वाले कुछ प्रसंग यहाँ दिए जा रहे है । एक बार भगवान् शिव अत्यंत मनोहारी स्वरुप धारण करके भ्रमण कर रहे थे।यद्यपि दिगंबर वेश है ,शरीर पर भस्म रमाये है सुंदर जटाएं है परंतु ऐसा सुंदर भगवान् का रूप करोडो कामदेवों को लज्जित कर रहा है। ऋषि यज्ञ कर रहे थे और शंकर जी वहा से अपनी मस्ती में रामनाम अमृत का पान करते करते जा रहे थे। भगवान् शिव के अद्भुत रूप पर मोहित होकर ऋषि पत्नियां उनके पीछे पीछे चली गयी। ऋषियो को समझ नहीं आया की यह हमारे धर्म का लोप करने वाला अवधूत कौन है जिसके पीछे हमारी पत्नियां चली गयी। पत्नियो नहीं रहेंगी तो हमारे यज्ञ कैसे पूर्ण होंगे? ऋषियो ने ध्यान लगाया तो पता लगा यह तो साक्षात् भगवान् शिव है। ऋषियो को क्रोध आ गया, ऋषियो ने श्राप दे दिया और श्राप से भगवान् शिव के शरीर में दाह(जलन) उत्पन्न हो गया। शंकर जी वहां से अंतर्धान हो गए। हिमालय की बर्फ में...