मां ब्रह्मचारिणी देवी दुर्गा के नौ रूपों में से दूसरा रूप हैं। नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है।

 मां ब्रह्मचारिणी देवी दुर्गा के नौ रूपों में से दूसरा रूप हैं। नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। मां ब्रह्मचारिणी का अर्थ: "ब्रह्म" का अर्थ है "तपस्या" और "चारिणी" का अर्थ है "जो तपस्या करती है"। मां ब्रह्मचारिणी को तपस्या और संयम की देवी माना जाता है। मां ब्रह्मचारिणी की कथा: मां ब्रह्मचारिणी ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठिन तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया कि वे उनकी पत्नी बनेंगी। मां ब्रह्मचारिणी की विशेषताएं: - मां ब्रह्मचारिणी को शक्ति और संयम की देवी माना जाता है। - वे अपने भक्तों को तपस्या और संयम की शक्ति प्रदान करती हैं। - मां ब्रह्मचारिणी की पूजा से व्यक्ति को आध्यात्मिक ज्ञान और शक्ति प्राप्त होती है। मां ब्रह्मचारिणी की पूजा: नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। इस दिन विशेष रूप से मां ब्रह्मचारिणी की आराधना की जाती है और उन्हें फूल, फल और अन्य चीजें चढ़ाई जाती हैं।

इस तरह रामचरित मानस बना धर्म शास्त्र!!!!!!!

 इस तरह रामचरित मानस बना धर्म शास्त्र!!!!!!!




* भव सागर चह पार जो पावा। राम कथा ता कहँ दृढ़ नावा॥

बिषइन्ह कहँ पुनि हरि गुन ग्रामा। श्रवन सुखद अरु मन अभिरामा॥


भावार्थ:-जो संसार रूपी सागर का पार पाना चाहता है, उसके लिए तो श्री रामजी की कथा दृढ़ नौका के समान है। श्री हरि के गुणसमूह तो विषयी लोगों के लिए भी कानों को सुख देने वाले और मन को आनंद देने वाले हैं॥


करीब पांच सौ साल पहले तक कोई धर्म ग्रंथ हिंदी में नहीं था। सभी धर्म ग्रंथ संस्कृत में थे और चूंकि मध्य काल में शिक्षा दीक्षा का चलन काफी कम हो गया था, भक्ति भावना या धर्म श्रद्धा के लिए लोग संस्कृत विद्वानों की ओर ही ताकते थे।


ऐसा कोई शास्त्र नहीं था, जो लोगों की अपनी भाषा में हो। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस लिख कर एक समाधान दिया था, लोकिन कठिनाई यह थी कि विद्वानों और धर्माचार्यों ने इसे मान्यता नहीं दी।


इसलिए धर्म भावना से भरे लोगों के मन में यह फांस अटकी रहती थी कि वे राम कथा से तो प्रेरणा ले रहे हैं लेकिन उनकी जानकारी का जो स्त्रोत है, वह धर्म शास्त्र नहीं है। क्योंकि धर्मशास्त्र तो संस्कृत में ही हो सकता है। पुरानी मान्यता है कि कोई शास्त्र अथवा ग्रंथ लोकप्रिय होने से स्वीकार्य नहीं हो जाता। 


स्वीकार्य वह रचना होती है जिसे विद्वतजनों ने मान्यता दी हो। तुलसीदास के मन में मानस की शुरुआत करते ही यह बात आई थी। उन्होंने हिंदी में ही रामकथा की रचना शुरू की। दो वर्ष सात महीने और छब्बीस दिन में सन् 1576 में यह रचना पूरी हुई।


कहते हैं कि रचना लेकर गोस्वामी जी काशी चले गए। वहां विश्वनाथ मंदिर में पहली बार इसका पाठ किया। वहां पंडितों ने रचना को सराहा तो सही लेकिन संस्कृत में नहीं होने की वजह से इसे काव्य की मान्यता नहीं दी। 


गोस्वामीजी इससे क्षुब्ध हो गए। मानस के संबंध में प्रचलित किवदंतियों के अनुसार काशी विश्वनाथ मंदिर में रखे जाने के बाद ग्रंथ पर सत्यम, शिवम सुंदरम के साथ भगवान शिव का नाम लिखा मिला। अनुश्रुति के अनुसार यह काशी विश्वनाथ की स्वीकृति थी।


लेकिन इस कहानी को मनगढंत माना गया है। रामचरितमानस के संबंध में इस तरह की कितनी ही कहानियां प्रचलित है जो उसकी महिमा को व्यक्त करती है। जैसे एक तो यही कि रामचरित मानस को चुराने के लिए चोर गए, वहां तुलसी की कुटिया में राम और लक्ष्मण पहरा देते हुए दिखाई दिए।


इस तरह की तमाम किवदंतियों के बावजूद मानस को शास्त्र की मान्यता नहीं मिली थी। उस समय के प्रसिद्ध रामभक्त संत नाभादास ने मानस के महत्व को समझा और इस ग्रंथ को लेकर विद्वानों के पास गए। 


स्वामी ज्ञानानंद, हरीराम तर्कवागीश, गदाधर भट्टाचार्य, विश्वेश्वर सरस्वती, माधव सरस्वती, नारायण तीर्थ आदि विद्वानों ने रामचरित मानस को देखा पढ़ा और सराहा, किंतु उसे शास्त्र की मान्यता देने में असमर्थता जताई।


असमर्थता इसलिए कि इनमें से कोई भी विद्वान रामचरितमानस पर टिप्पणी करता तो यह उसकी अपनी राय होती। हरीराम तर्कवागीश ने राय दी कि प्रयाग कुंभ के समय सभी संतजन और विद्वान एकत्रित होंगे। ग्रंथ को उनके सामने रखा जाए, सभी संत और धर्माचार्य विचार करें फिर इस संबंध में सर्वसम्मति से इस विषय में कोई निर्णय लिया जाए।


कुंभ पर्व में अभी सात वर्ष की देर थी। इसलिए साल भर बाद 1577 में होने वाले समष्टि समारोह (संत समागम) पर अर्धकुंभ पर उस बारे में विचार की बात सोची गई। यह अर्धकुंभ का अवसर भी था।


संगीति की अध्यक्षता अद्वैत वेदांत के प्रमुख विद्वान मधुसूदन सरस्वती कर रहे थे। उन्होंने संगीति में उपस्थित सभी विद्वानों से ग्रंथ की परीक्षा के लिए कहा। इस काम में लगभग एक माह लगा।


परीक्षा में ग्रंथ के चरितनायक, सर्ग अर्थात सृष्टि का वर्णन, धर्म मर्यादा, अर्थ, काम और मोक्ष तथा लोकरीतियों के संपूर्ण मार्गदर्शन की संभावना को परखना था। एक माह बाद सभी विद्वानों ने अपने अपने निष्क र्ष आचार्य मधुसूदन सरस्वती को सौंपे।


माघ मेला समाप्त होने को था और उस वर्ष प्रयाग के तट पर कुंभ का आयोजन चल रहा था। आचार्य ने घोषणा की कि सभी विद्वानों ने रामचरितमानस में शास्त्र में निर्धारित विशेषताएं देखी और प्रमाणित की हैं।


इसलिए मानस को धर्म शास्त्र माना जा सकता है। उल्लेखनीय है कि रामचरितमानस के बाद से अब तक किसी और ग्रंथ को धर्मशास्त्र की मान्यता नहीं मिली है।


सिर्फ इसी ग्रंथ के सप्ताह नवाह्न और मास पारायण के विधि विधान निर्धारित हैं। हिंदी या भाषा का पहला धर्मशास्त्र है जिसके छंदों को मंत्रों की मान्यता मिली है। और बहुतों ने उनकी  साधना की है उसके सत्परिणाम देखे हैं।


* राम चरित जे सुनत अघाहीं। रस बिसेष जाना तिन्ह नाहीं॥

जीवनमुक्त महामुनि जेऊ। हरि गुन सुनहिं निरंतर तेऊ॥


भावार्थ:-श्री रामजी के चरित्र सुनते-सुनते जो तृप्त हो जाते हैं (बस कर देते हैं), उन्होंने तो उसका विशेष रस जाना ही नहीं। जो जीवन्मुक्त महामुनि हैं, वे भी भगवान्‌ के गुण निरंतर सुनते रहते हैं॥


* श्रवनवंत अस को जग माहीं। जाहि न रघुपति चरित सोहाहीं॥

ते जड़ जीव निजात्मक घाती। जिन्हहि न रघुपति कथा सोहाती॥


भावार्थ:-जगत्‌ में कान वाला ऐसा कौन है, जिसे श्री रघुनाथजी के चरित्र न सुहाते हों। जिन्हें श्री रघुनाथजी की कथा नहीं सुहाती, वे मूर्ख जीव तो अपनी आत्मा की हत्या करने वाले हैं॥

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