मां ब्रह्मचारिणी देवी दुर्गा के नौ रूपों में से दूसरा रूप हैं। नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है।

 मां ब्रह्मचारिणी देवी दुर्गा के नौ रूपों में से दूसरा रूप हैं। नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। मां ब्रह्मचारिणी का अर्थ: "ब्रह्म" का अर्थ है "तपस्या" और "चारिणी" का अर्थ है "जो तपस्या करती है"। मां ब्रह्मचारिणी को तपस्या और संयम की देवी माना जाता है। मां ब्रह्मचारिणी की कथा: मां ब्रह्मचारिणी ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठिन तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया कि वे उनकी पत्नी बनेंगी। मां ब्रह्मचारिणी की विशेषताएं: - मां ब्रह्मचारिणी को शक्ति और संयम की देवी माना जाता है। - वे अपने भक्तों को तपस्या और संयम की शक्ति प्रदान करती हैं। - मां ब्रह्मचारिणी की पूजा से व्यक्ति को आध्यात्मिक ज्ञान और शक्ति प्राप्त होती है। मां ब्रह्मचारिणी की पूजा: नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। इस दिन विशेष रूप से मां ब्रह्मचारिणी की आराधना की जाती है और उन्हें फूल, फल और अन्य चीजें चढ़ाई जाती हैं।

चिंतन क्या है ?????

 चिंतन क्या है ??????




* श्रोता सुमति सुसील सुचि कथा रसिक हरि दास।

पाइ उमा अति गोप्यमपि सज्जन करहिं प्रकास॥


भावार्थ:-हे उमा! सुंदर बुद्धि वाले सुशील, पवित्र कथा के प्रेमी और हरि के सेवक श्रोता को पाकर सज्जन अत्यंत गोपनीय (सबके सामने प्रकट न करने योग्य) रहस्य को भी प्रकट कर देते हैं॥


चिंतन का मतलब होता है किसी बात की गहराई में जाना। उसको कई प्रकार से सोचना। यह बात सत्य है कि कर्म की अवधारणा चिंतन पर टिकी है, जब तक हम किसी काम के बारे मे सोचेंगे ही नहीं तो काम क्या करेंगे? और उसे कैसे पूरा करेंगे? 


लेकिन कोई काम केवल चिंतन मात्र से भी तो पूरा नहीं होता है, उसे पूरा करने के लिये मन से कर्म समझ कर करना आवश्यक है, बल के साथ यदि दूरी नहीं तय की गई है तो किया हुआ कार्य भी शून्य होगा यानी कि बल का प्रयोग कितना भी क्यों न हो, बस इसी तरह हम मन से खूब सोचें किंतु जब तक कर्मणा अर्थात कार्यरूप मे नहीं जाते तो हमारा कार्य शून्य ही रहेगा।


मनसा, वाचा,कर्मणा संस्कृत की यह सूक्ति अपने में कर्म के उत्पत्ति की सारी अवधारणायें छुपाये हुए है, इस कर्मभूमि में घटित होने वाली सारी क्रियाओं का सम्पादन इसी सूत्र से होता है, किसी भी कार्य की रूपरेखा या किसी भी तरह का लक्ष्य निर्धारण कैसे होता है, और निर्धारण के बाद कैसे पूरा होता है, मनसा वाचा कर्मणा के सिद्धांत से समझ सकते हैं।


मनसा वाचा कर्मणा का सिद्धांत है- हमने जीवन में सफल होनें के लिए खूब सोंचा और खूब योजनायें बनायीं, किंतु उन योजनाओं के अनुरूप कार्य नहीं किया तो हम जीवन में सफल नहीं हो सकते हैं, सज्जनों! हम किसी भी काम को करने के पहले उसके बारे में सोचते हैं, मान ले कि परीक्षा में अच्छे अंक लाना है तो सर्व प्रथम अपने मन में निश्चय करना होगा कि हमें परीक्षा मे अच्छे अंक लाना है।


लेकिन अच्छे अंक लाने हेतु मन नहीं बनायें, या यह विचार नहीं लाये कि आपको परीक्षा मे अच्छे अंक लाना है तब तक आप उतनी लगनशीलता से अध्ययन नहीं कर पायेंगे,  इसलिये आपको लक्ष्य प्राप्ति का निर्धारण तो करना ही होगा, अब आपके मन ने अपना लक्ष्य निर्धारित कर लिया है कि उसे परीक्षा में अच्छे अंक लाना है, इसके लिए कुछ न कुछ आपको संसाधन जैसे स्टेशनरी, पाठ्य पुस्तकें,कोचिग आदि की आवश्यकता होगी ही, तब आपको अपनें अविभावक या माता पिता से अपनी बात कहनी होगी।


इस तरह से मन में सोचने के बाद उसे आपको वाणी के द्वारा व्यक्त करना होगा, अब तक आपने परीक्षा में अच्छे अंक लाने के लिए अभी तो केवल मन और वचन से प्रयास किया गया है बाकी अभी भी आपका कर्म शेष है, आपका लक्ष्य दो चरणों में पूरा हो चुका है मन और वचन से अब परीक्षा में अच्छे अंक लाने का काम आपके द्वारा चालू है तो क्या हम कह सकते हैं कि आपका दो तिहाई काम समाप्त हो चुका है, यह पूर्णत: गलत है, जब तब तीसरा चरण पूरा नहीं होता है कार्य फल शून्य रहता है।


अब आपको सफलता के लिए कर्म अनिवार्य है किंतु इसके साथ यह भी सत्य है कि कि विना सोचे समझे कोई भी कार्य सम्भव नही है, कार्य या लक्ष्य प्राप्ति का प्रथम सोपान विचार अर्थात मनसा है, जिस पर वाचा अर्थात संसाधनों की जुगत के साथ ही हम लक्ष्य प्राप्ति का अंतिम सोपान कर्मणा है, यानी उस काम को अंजाम तक पहुंचाने के लिये अथक प्रयास करना।


जय श्री कृष्ण!

हरि ओऊम् तत्सत्

Comments

Popular posts from this blog

"भलाई का कार्य"

*कुसुम सरोवर का सुंदर प्रसंग

Sushant Singh rajput new movie release (Dil BECHARA)