मां ब्रह्मचारिणी देवी दुर्गा के नौ रूपों में से दूसरा रूप हैं। नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है।

 मां ब्रह्मचारिणी देवी दुर्गा के नौ रूपों में से दूसरा रूप हैं। नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। मां ब्रह्मचारिणी का अर्थ: "ब्रह्म" का अर्थ है "तपस्या" और "चारिणी" का अर्थ है "जो तपस्या करती है"। मां ब्रह्मचारिणी को तपस्या और संयम की देवी माना जाता है। मां ब्रह्मचारिणी की कथा: मां ब्रह्मचारिणी ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठिन तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया कि वे उनकी पत्नी बनेंगी। मां ब्रह्मचारिणी की विशेषताएं: - मां ब्रह्मचारिणी को शक्ति और संयम की देवी माना जाता है। - वे अपने भक्तों को तपस्या और संयम की शक्ति प्रदान करती हैं। - मां ब्रह्मचारिणी की पूजा से व्यक्ति को आध्यात्मिक ज्ञान और शक्ति प्राप्त होती है। मां ब्रह्मचारिणी की पूजा: नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। इस दिन विशेष रूप से मां ब्रह्मचारिणी की आराधना की जाती है और उन्हें फूल, फल और अन्य चीजें चढ़ाई जाती हैं।

शरभ अवतार कथा....

 शरभ अवतार कथा....


भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार लेने की कथा तो सभी जानते हैं लेकिन भगवान के उस अवतार को शांत करने के लिए स्वयं भगवान शिव को भी अवतार लेना पड़ा था, इसके बारे में बहुत कम लोग ही जानते है। हालाँकि इस कथा का वर्णन विष्णु पुराण में नही मिलता है लेकिन शिव पुराण में इसका वर्णन किया गया है।


यह अवतार भगवान शिव के शरभ अवतार से जुड़ा हैं जो भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार से भी ज्यादा भयंकर है। आज हम आपको उसी शरभ अवतार की कथा के बारे में बताएँगे।


भगवान शिव के शरभ अवतार लेने की कथा नरसिंह अवतार का रूद्र रूप


जन्म से ही प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था लेकिन उसके पिता हिरण्यकश्यप विष्णु को भगवान नही मानता था। उसने तीनों लोकों में स्वयं को भगवान घोषित किया हुआ था। अपने पुत्र के विष्णु भक्त होने के कारण हिरण्यकश्यप ने कई बार उसका वध करने का प्रयास किया था। किंतु भगवान विष्णु हमेशा अपने भक्त प्रह्लाद के प्राणों की रक्षा कर लेते थे लेकिन उनका क्रोध दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा था। एक दिन उनके संयम की सीमा समाप्त हो गयी।


उसी क्रोध में उन्होंने नरसिंह अवतार लिया जो कि अत्यधिक भयानक था। उसका आधा शरीर सिंह का तथा बाकि का आधा शरीर मनुष्य का था। वह दिखने में अत्यधिक भयानक, फुंफकार करता हुआ तथा बड़े-बड़े नाखूनों वाला था। उन्होंने अपने इन्हीं नाखूनों की सहायता से हिरण्यकश्यप का पेट फाड़ दिया तथा उसका वध कर दिया।


विष्णु पुराण के अनुसार यह कथा यही समाप्त हो जाती हैं। उसमे लिखा हैं कि इसके पश्चात प्रह्लाद भगवान नरसिंह का क्रोध शांत करते है। भगवान नरसिंह भी अपने भक्त प्रह्लाद को अत्यधिक स्नेह देते हैं तथा उन्हें अपने पिता का उत्तराधिकारी घोषित करके वापस श्रीहरि में समा जाते हैं। किंतु शिवपुराण में हिरण्यकश्यप के वध के पश्चात अन्य प्रसंग लिखा हुआ है जो कि शिव के शरभ अवतार लेने से जुड़ा है। आइये उसी के बारे में जानते हैं।


शिव पुराण के अनुसार भगवान शिव का शरभ अवतार लेना

जब भगवान नरसिंह ने हिरण्यकश्यप का वध कर दिया तब भी उनका क्रोध शांत नही हुआ। वे क्रोध में इधर-उधर विचरण करने लगे तथा सृष्टि का विनाश करने लगे। उनके क्रोध से पूरी धरती थरथराने लगी थी। सभी देवताओं तथा दैत्यों में भय व्याप्त हो गया था तथा किसी में भी इतना साहस नही था कि वह उनके उस भयंकर अवतार के पास जा सके। स्वयं प्रह्लाद भी भगवान नरसिंह का क्रोध शांत करवाने में असफल हुए थे।


डर के मारे सभी भगवान शिव से सहायता मांगने गए तथा सृष्टि को बचाने की याचना की। तब भगवान शिव ने अपने एक रूप वीरभद्र को भगवान नरसिंह को शांत करवाने भेजा। उन्होंने भगवान नरसिंह को उनके पिछले तीन रूपों मत्स्य, कच्छप तथा वराह अवतार के बारे में बताया। साथ ही उन्होंने नरसिंह अवतार लेने का उद्देश्य भी समझाया लेकिन भगवान नरसिंह का क्रोध शांत ही नही हो रहा था।


जब भगवान शिव ने यह देखा तो उन्होंने नरसिंह अवतार से भी बड़ा व भयानक अवतार लेने का निश्चय किया। इसके पश्चात भगवान शिव शरभ अवतार लेकर उनके पास गए। शरभ अवतार में नरसिंह अवतार की सभी विशेषताएं थी जैसे कि यह भी सिंह तथा मानव रूप लिए हुए था लेकिन इसके साथ ही इसमें जंगली पक्षी का भी रूप था। इस अवतार में उनके दो गरुड़ पंख, भयानक शेर के पंजे व चोंच, वीरभद्र की सहस्त्र भुजाएं, शीश पर जटा तथा चंद्रमा स्थापित थे।


शरभ अवतार इतना ज्यादा भीषण तथा भयंकर था कि यह ब्रह्मांड का सबसे शक्तिशाली प्राणी था। यह अवतार उड़कर क्रोधित नरसिंह अवतार के पास आया तथा उसे अपने पंजों में जकड़ लिया। उसके बाद शरभ अवतार नरसिंह भगवान को लेकर आकाश में उड़ गया। आकाश में उसने नरसिंह अवतार के शरीर पर चोंच तथा पंजो से कई बार प्रहार किया तथा उनका शरीर कई जगहों से फाड़ दिया। शरभ अवतार ने नरसिंह अवतार का वध कर दिया तथा उसकी खाल को अपने वस्त्रों के रूप में धारण किया।


इसके पश्चात भगवान विष्णु अपने उस शरीर को छोड़कर वापस श्रीहरि में समा गए। उन्होंने शरभ अवतार से वापस अपने आदि अवतार में आने की प्रार्थना की। भगवान विष्णु के इतना कहने पर ही शरभ अवतार अपने भगवान शिव रुपी अवतार में आ गया। भगवान शिव ने उन्हें बताया कि उन्होंने यह अवतार केवल नरसिंह अवतार को शांत करने तथा सृष्टि के कल्याण के उद्देश्य से धारण किया था।


शरभ अवतार का उद्देश्य व शिक्षा


इस कथा तथा शरभ अवतार से भगवान शिव ने यह शिक्षा दी कि हम अपने क्रोध को किस प्रकार शांत कर सकते है। भगवान विष्णु अपने भक्त प्रह्लाद पर दिन-प्रतिदिन हो रही यातनाओं से इतने व्यथित थे कि एक दिन उनका क्रोध फूट पड़ा लेकिन अपना लक्ष्य पूरा करने के पश्चात भी उनका क्रोध शांत नही हो रहा था।


इस पर भगवान शिव ने उससे भी भयंकर तथा क्रोधित रूप धारण किया लेकिन अपना लक्ष्य पूर्ण होने के पश्चात वे आसानी से अपने असली रूप में आ गए। इस प्रकार भगवान शिव ने मानव जाति को संदेश दिया कि किस प्रकार हमें क्रोध को स्वयं पर हावी होने देने से बचना चाहिए तथा किसी भी स्थिति में क्रोध को शांत कर लेना चाहिए।


शरभ अवतार से जुड़ा विवाद 


कुछ लोग भगवान शिव के इस अवतार को नही मानते हैं तथा उनके अनुसार यह केवल एक मनगढ़ंत कथा है। यह कथा केवल भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार को कमतर आंकने तथा उन्हें नीचा दिखाने के उद्देश्य से कही गयी है। उनके अनुसार हिरण्यकश्यप का वध करने के पश्चात भगवान नरसिंह का अवतार प्रह्लाद के कहने पर अपने आप शांत हो जाता है तथा उसका राजभिषेक करके श्रीहरि में समा जाता है। हालाँकि दोनों ही कथाएं प्रसिद्ध हैं। एक का वर्णन विष्णु पुराण में तो दूसरी का वर्णन शिव पुराण में मिलता है। हमें इस पर वाद-विवाद करने की बजाये इनसे मिली शिक्षा को ग्रहण करना चाहिए।


हालाँकि इसके बाद की भी कुछ कथाएं प्रचलित हैं जिसमे शिव के शरभ अवतार लेने के बाद भगवान विष्णु एक और अवतार लेते हैं जिसका नाम गंडभेरुंड होता है। तब माँ आदिशक्ति दोनों को शांत करवाने के उद्देश्य से अपना सबसे उग्र रूप प्रत्यंगिरा धारण करती हैं और दोनों को शांत करवाती हैं।

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