शब्द-साधना से शब्द-ब्रह्म की प्राप्ति मानस-दर्शन, श्लाघ्य!!!!!!•
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शब्द-साधना से शब्द-ब्रह्म की प्राप्ति
मानस-दर्शन, श्लाघ्य!!!!!!•
होइ न विषय बिराग,भवन बसत भा चौथनु।
हृदय बहुत दुख लाग जनम गयउ हरि भगति बिनु।।1/142
साधना क्रम में एक पद्धति बैराग्य की,तथा दूसरी है राग की पद्धति ।किसी के अंतःकरण में बैराग्य की बृत्ति प्रबल होती है,और कुछ लोगों में संसार के प्रति राग की बृत्ति होती है।अब प्रश्न यह है कि रागी को भगवान मिलेंगे या बैरागी को?
बेदान्त की परम्परा में तो बैराग्य से ही ज्ञान मिलेगा-
“बिनु गुरु होइ कि ग्यान,ग्यान कि होइ बिराग बिनु”।7/89
ज्ञान और बैराग्य का अद्भुत संबंध है।अतः बेदान्त का मत है कि,बिना बैराग्यके ब्रह्म तत्व का साक्षात्कार संभव नहीं है।
पर भक्त इसे नहीं मानता।मनु के जीवन में समस्या यह थी कि वे शास्त्रों के पंडित थे,बैराग्य से भलीभाँति परिचित थे,पर जब अपनी ओर देखते हैं तो दिखाई देता है कि-
‘होइ न बिषय बिराग,भवन बसत भा चौथनु।
हृदय बहुत दुख लाग,जनम गयउ हरि भगति बिनु।’
तब उन्होंने त्याग का आश्रय लिया।
मनु को मुक्ति की इच्छा होती,तो पत्नी को साथ लेकर न जाते।उनका अभिप्राय यह है कि,ईश्वर को बेटा बनाना है,इसलिए शतरूपा को साथ
लेकर जाना अनिवार्य है,यह मानो ‘राग’का सदुपयोग है।
वस्तुतः दोनों पक्ष अपने अपने स्थान पर ठीक हैं ।ज्ञान का संबंध बैराग्य
से है और भक्ति का संबंध अनुराग से।मनु का अंतःकरण अनुरागी है,इसलिए पत्नी को साथ लेकर जा रहे हैं ।
गोस्वामी जी ने एक सुन्दर वाक्य लिखा-
“पंथ जात सोहहिं मति धीरा।ग्यान भगति जनु धरें सरीरा।”
अतः इस साधना में आपको ज्ञान तथा भक्ति दोनों का सामंजस्य मिलेगा। गोस्वामी जी आगे वर्णन करते हैं-
“पहुँचे जाइ धेनुमति तीरा।हरषि नहाने निर्मल नीरा।
धेनु का अर्थ है-‘सात्विक श्रद्धा धेनु सुहाई।’यानी श्रद्धाऔर मति का अर्थ है बुद्धि।गोमती नदी के स्थान पर गोस्वामी जी का धेनुमति लिखने का अभिप्राय यह है कि जब तक हम श्रद्धा युक्त बुद्धि से आगे नहीं बढ़ेंगे,तब तक भगवत्प्राप्ति संभव नहीं हो पायेगी।
इसके पश्चात तीर्थों की यात्रा -
“जहँ जहँ तीरथ रहे सुहाए।मुनिन्ह सकल सादर करवाए।”
ए सब साधना क्रम हैं ।तीर्थ धर्म, अर्थ, काम,मोक्ष आदि अनंत फलों को देने वाले हैं ।इसके बाद वे मुनियों के द्वारा कथा श्रवण करते हैं -
“कृस सरीर मुनिपट परिधाना।सत समाज नित सुनहिं पुराना।”
और उस कथा में मंत्र की महिमा सुनने के पश्चात मंत्र साधना का प्रारंभ हो गया।और ‘द्वादशाक्षर मंत्र’’ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय’की दीक्षा ग्रहण की,तथा उसका बिधि पूर्वक जप करने लगे-
“द्वादश अच्छर मंत्र पुनि जपहिं सहित अनुराग ।
वासुदेव पद पंकरुह दंपति मन अति लाग।।”
तात्विक दृष्टि से’वसुदेव’शब्द का जो अर्थ किया गया है-
“वासे वासे तिष्ठति”
के अनुसार,जिसका सर्वत्र निवास है।इसका अर्थ यह है कि अभी तक मनु
सर्व ब्यापक को जप रहे हैं, यानी शब्द की साधना तो प्रारंभ हुयी,किन्तु
रूप का कोई निश्चय नहीं है।
इसीलिए मनु के सामने ब्रह्माजी आए,शंकर आए तथा विष्णुजी आकर खड़े हो गये,परन्तु मनु को किसी को देखकर संतोष नहीं हुआ।
मनु को संतोष तब हुआ,जब उनकी साधना आगे बढ़ी,तथा उन्होंने इस
मंत्र का यह अर्थ लिया कि-
“करहिं अहार साक फल कंदा।सुमिरहिं ब्रह्म सच्चिदानंदा।”
यहाँ पर ब्रह्म शब्द का प्रयोग किया गया है।यह बेदान्त का प्रिय शब्द है।जब मनु से पूछा गया कि जिस मंत्र का जप कर रहे हैं, उसका रूप क्या है?उन्होंने कहा,मैं उस ब्रह्म का जप कर रहा हूँ जो-
“अगुन अखंड अनंत अनादी।जेहि चिन्तहिं परमारथवादी।
नेति नेति जेहि बेद निरूपा।निजानंद निरुपाधि अनूपा।”
जो ऐसा है।उनसे प्रश्न हुआ कि आप चाहते क्या हैं? कहा कि मैं उनका
रूप देखना चाहता हूँ, जब कहा गया कि जब वह अरूप है,तो फिर
रूप कौनसा होगा उसका,तो मनु का संकेत था कि मैंने कथा सत्संग आदि
में सुना है कि,जो निर्गुण निराकार ब्रह्म है,वह भी भक्तों की भावना को पूर्ण करने के लिए लीला स्वरूप स्वीकार करता है-
“ऐसे प्रभु सेवक बस अहई।भगत हेतु लीला अनु गहई।
”मुझे विश्वास है कि यदि बेदों का यह वाक्य सत्य है,तो मेरे लिए भी वे अवश्य लीला स्वरूप स्वीकार करेंगे-
“जौ यह बचन सत्य श्रुति भाषा।तौ हमार पूजिहि अभिलाषा ।”
इस प्रकार मूल में मंत्र-साधना का प्रारंभ हुआ।और दर्शन देने ब्रह्मा,विष्णु, शंकर आ गये,किन्तु मनु ने कहा कि हमें आप लोगों से कुछ लेना देना नहीं है।परिणाम यह हुआ रूप वापस चले गये।
इसका निष्कर्ष यह हुआ कि यहाँ पहले रूप आया और बाद में शब्द ।पर जब निर्गुण,निराधार ब्रह्म सगुण साकार बन कर आया तो शब्द पहले आया,रूप बाद में ।
मनु को आकाशवाणी सुनाई पड़ी।यह गोस्वामी जी का दर्शन है,बन्धुओं!। संसार में पहले आकार आता है,फिर उसको नाम दिया जाता है,एक ब्रह्म ही ऐसा है जिनका नाम शब्द के रूप में पहले होता है और रूप बाद में
होता है।
पहले आकाशवाणी हुयी,यह भी ईश्वरके आने का क्रम है। जब निराकार की कल्पना की,तो मानो आकाश के रूप में बात आ गयी,पर जब उसको साकार बनाने की बात आई,तो साकार के रूप में सबसे पहले शब्द बनेगा और यहाँ पर शब्द बन भी गया कि-“मागु मागु बरु भे नभ बानी।”
बरदान माँगो!बरदान माँगो! मनु की जो साधना पद्धति है,उसमें पहले
शब्द ही आता है-
“मृतक जियावनि गिरा सुहाई।श्रवन रंध्र होइ उर जब आई।
हृष्ट पुष्ट तन भए सुहाए।मानहु अबहिं भवन ते आऐ।
जब उनसे पूछा गया,क्या चाहते हो?उन्होंने कहा,प्रभु मैने भी मंत्र से प्रारंभ किया।मानो मेरी साधना शब्द से शुरू हुयी है और आप ने भी दर्शन पहले शब्द के रूप में दिया।पहले आपने कान के माध्यम से अपना परिचय दिया,अब जरा आँखों के सामने आ जाइए।भगवान ने कहा यदि मेरा रूप तुम्हें पसंद न आया तो?क्योंकि मेरा तो कोई रूप है नहीं ।अतः रूप बताओ!
मनु ने जो रूप बताया,जरा गौर करें -
“जो सरूप बस सिव मन माहीं।जेहि कारन मुनि जतन कराहीं।”
शंकरजी महान ज्ञानी हैं, इस प्रकार एक ज्ञानी का नाम लिया।फिर कहा-
“जो भुसुंडि मन मानस हंसा।सगुन अगुन जेहिं निगम प्रसंसा।”
काकभुसुंडिजी भक्ति के पक्षपाती हैं।और राम के अनन्य उपासक हैं ।
परिणाम हुआ कि-
“भगत बछल प्रभु कृपा निधाना।बिश्ववास प्रगटे भगवाना।”
भगवान शंकर ने भी कहा-”अग जग मय सब रहित बिरागी”।
सर्व ब्यापक प्रभु मनु की साधना से प्रसन्न होकर प्रगट हो गये।
इसका सीधा सा अर्थ है कि तत्वतः अगर बिचार करके देखें,तो हमें यह स्पष्ट दिखाई देगा कि रूप पहले नहीं हो सकता है,जब होगा,तो शब्द ही पहले होगा।इसीलिए रूप को लेकर बिबाद है,किन्तु नाम को लेकर कोई विबाद
नहीं है।
तुलसीदास और कबीर की मान्यताओं में अन्तर है,किन्तु रामनाम के संदर्भ में दोनों एकमत हैं ।गुरु नानक की वाणी में भी रामनाम की महिमा का वर्णन है। ब्रह्मांड की परिक्रमा तो गति की परीक्षा है,किन्तु रामायण में अंगद ने कहा-
‘चले बहुत सो बीर न होई।’
इसीलिये नारद ने कहा ‘आप रामनाम लिखकर’परिक्रमा कर लीजिये।
शंकर जी ने पूछा-बीच से ही लौट आए क्या?गणेशजी ने कहा मैं ब्रह्मांड की परिक्रमा करके आया हूँ ।शंकरजी ने पूछा कैसे?गणेशजी ने कहा,सृष्टि के मूल में वस्तुतः नाम तत्व है।मंत्र तथा अक्षर तत्व हैं, उसी के द्वारा ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई है।और ब्रह्मांडकी परिक्रमा का वास्तविक अर्थ है,ब्रह्मांड के वास्तविक मूल को जान लेना।
भगवान शंकर ने गदगद होकर निर्णय देते हुए कहा कि गणेश ही वस्तुतः प्रथम पूजा पाने के योग्य हैं ।
“नाम निरूपन नाम जतन तें।सोइ प्रकटत जिमि मोल रतन तें।
तप-सिद्धी का मूल मंत्र-जाप ही है।
नमन अग्रज। दिवाकर मिश्रा की वाल से साभार
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