मां ब्रह्मचारिणी देवी दुर्गा के नौ रूपों में से दूसरा रूप हैं। नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है।

 मां ब्रह्मचारिणी देवी दुर्गा के नौ रूपों में से दूसरा रूप हैं। नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। मां ब्रह्मचारिणी का अर्थ: "ब्रह्म" का अर्थ है "तपस्या" और "चारिणी" का अर्थ है "जो तपस्या करती है"। मां ब्रह्मचारिणी को तपस्या और संयम की देवी माना जाता है। मां ब्रह्मचारिणी की कथा: मां ब्रह्मचारिणी ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठिन तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया कि वे उनकी पत्नी बनेंगी। मां ब्रह्मचारिणी की विशेषताएं: - मां ब्रह्मचारिणी को शक्ति और संयम की देवी माना जाता है। - वे अपने भक्तों को तपस्या और संयम की शक्ति प्रदान करती हैं। - मां ब्रह्मचारिणी की पूजा से व्यक्ति को आध्यात्मिक ज्ञान और शक्ति प्राप्त होती है। मां ब्रह्मचारिणी की पूजा: नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। इस दिन विशेष रूप से मां ब्रह्मचारिणी की आराधना की जाती है और उन्हें फूल, फल और अन्य चीजें चढ़ाई जाती हैं।

परमात्मा की प्राप्ति में भाव ही प्रधान है!!!!!!

 परमात्मा की प्राप्ति में भाव ही प्रधान है!!!!!!


भाव का भूखा हूँ मैं, बस भाव ही एक सार है ।

भाव से मुझको भजे तो, उसका बेड़ा पार है ।।

अन्न धन अरु वस्त्र भूषण, कुछ न मुझको चाहिए।

आप हो जायें मेरे बस, पूरण यह सत्कार है ।।

भाव बिन सूनी पुकारें, मैं कभी सुनता नहीं ।

भाव की एक टेर ही, करती मुझे लाचार है।।

भाव बिन सब कुछ भी दें तो, मैं कभी लेता नहीं।

भाव से एक फूल भी दे, तो मुझे स्वीकार है ।।

जो भी मुझमें भाव रख कर, आते हैं मेरी शरण।

मेरे और उसके हृदय का, एक रहता तार है ।।


मनुष्य के हृदय के भावों में विराजते हैं भगवान!!!!!!!!


ईश्वर हृदय के भावों में ही रहते हैं, कहीं जाते नहीं हैं और कहीं से आते भी नहीं है । भावपूर्ण मन जब उनके सम्मुख होता है, तभी वह आ (प्रकट हो) जाते हैं और जब मन ईश्वर से विमुख और संसार में लीन होता है तब वह चले (छिप) जाते है । हृदय में सच्चे भाव होने पर जब आराधक व आराध्य की आंख से आंख मिलती है, तब दोनों ओर से आनन्द की लहर उठना ही भगवान को प्रकट होने के लिए बाध्य कर देता है ।


न देवो विद्यते काष्ठे, न पाषाणे न मृन्मये ।

भावो हि विद्यते देवस्तस्माद् भावो हि कारणम्।।


अर्थात्—भगवान न तो लकड़ी की मूर्ति में विराजमान हैं, न पत्थर और न मिट्टी की मूर्ति में । भगवान तो केवल भाव में ही विद्यमान हैं । भाव के द्वारा ही मानव भगवान को प्राप्त कर सकता है ।


प्राय: अधिकांश घरों में बालगोपाल या अन्य किसी मूर्ति की पूजा पीढ़ियों से की जाती रही है, लेकिन मनुष्य को इस पूजा से कोई विशेष सिद्धि मिलती नहीं दिखाई देती है । इसका एक प्रमुख कारण है—मनुष्य में ‘मूर्ति में भगवान हैं’ की भावना का न होना । अधिकांश लोग बस रुटीन पूरा करने के लिए ही पूजा-पाठ करते हैं । नित्य पूजा में देह तो पूजाघर में होती है और मन कहीं और; इसीलिए पूरी जिन्दगी पूजा करते बीत जाती है पर कोई सिद्धि हाथ नहीं लगती है । 


मन में कुछ भाव होगा तो वहां भगवान अवश्य आयेंगे । वह तो हृदय की लगन देखते हैं । कलिकाल में ‘भाव का अकाल’ पड़ता जा रहा है । इसलिए पूजा का सही लाभ प्राप्त करने के लिए मनुष्य को अपने भाव की रक्षा करनी चाहिए उसे और बढ़ाते रहना चाहिए ।


भगवत्साक्षात्कार के लिए ‘मूर्ति में भगवान हैं’ की भावना’ ही सबसे महत्वपूर्ण : भक्ति कथा!!!!!!


‘मूर्ति में भगवान है’ की भावना रखना कितना महत्वपूर्ण है—इसी को दर्शाती एक रोचक कथा यहां दी जा रही है—



एक विद्वान पंडितजी के मन में प्रौढ़ावस्था में मूर्ति पूजा करने की इच्छा जागी । वे बाजार से बालगोपाल की एक पीतल की मूर्ति लेकर आए और उसकी प्राण-प्रतिष्ठा कर के सिंहासन पर विराजित कर दिया । प्रकाण्ड विद्वान तो वे थे ही; प्रतिदिन पूरे विधि-विधान, लगन व श्रद्धा से वे उनकी पूजा करने लगे ।


देखते-ही-देखते बालगोपाल की पूजा करते छ: वर्ष बीत गए परन्तु गोपाल प्रकट नहीं हुए । वे और अधिक लगन व सावधानी से बालगोपाल का अर्चन करने लगे परन्तु ईश्वर का साक्षात्कार न होने से यह निष्ठा व लगन कब तक रहती ? 


एक दिन वे सोचने लगे—‘छ: वर्ष व्यतीत हो गए किन्तु गोपाल ने अभी तक दर्शन नहीं दिए ?’ वे व्याकुल रहने लगे—


जनम जनम के बीछुरे, हरि ! अब रह्यौ न जाय।

क्यों मन कूँ दुख देत हो, बिरह तपाय तपाय ।। (दयाबाई)


साधक को भगवान की प्राप्ति में देरी होने का कारण यही है कि वह भगवान के वियोग को सहन कर रहा है । यदि उसे भगवान का वियोग असह्य हो जाए तो भगवान के मिलने में देरी नहीं होगी।


उन्हीं दिनों किसी ने पंडितजी को बताया कि दुर्गा ‘मां’ होने के कारण उपासक पर शीघ्र ही कृपा करके दर्शन देती हैं । उन्होंने मां की उपासना करने का निश्चय किया ।


बालगोपाल के सिंहासन के ऊपर एक ताक था, पंडितजी ने बालगोपाल को उठाकर ताक पर रख दिया और सिंहासन पर देवी मां की मूर्ति प्रतिष्ठित कर दी और बड़ी लगन, श्रद्धा और सावधानी से मां की उपासना करने लगे । मां की पूजा में वे इतने तल्लीन हो गए कि कभी-कभी पूरी रात जागरण कर मां की उपासना करते रहते थे । इस तरह फिर छ: वर्ष गुजर गए; पर मां का भी साक्षात्कार नहीं हुआ। निराशा की बदली फिर छा गई ।


एक दिन उन्होंने जब अपनी पूजा का आत्मविश्लेषण किया तो उसमें उन्हें कोई गलती नहीं दिखायी पड़ी । अब उनकी व्याकुलता चरम पर पहुंच गई ।


एक दिन वे अत्यन्त दु:खी होकर मां के सामने बैठे हवन कर रहे थे । अचानक उनकी दृष्टि बालगोपाल की मूर्ति पर गई जिसे वह छ: वर्ष पूर्व ताक पर रखकर भूल गए थे । वह मूर्ति अभी भी वहीं रखी हुई थी । हवन व धूप का धुआं ताक पर बैठी बालगोपाल की मूर्ति के मुख से होता हुआ जा रहा था । 


यह देखते ही उन्होंने सोचा—‘मां प्रसन्न हों भी तो कैसे ? मैं जो हवन, पूजा करता हूँ, उसे तो यह ग्वाला ताक में से मुंह निकाले ग्रहण कर लेता है ।’


बालगोपाल पर थोड़ा क्रोधित होते हुए वे बोले—‘अच्छा, ठहर जा ! मैं तेरी नाक में रुई ठूंस देता हूँ, फिर देखूं, यह कैसे मां को अर्पित किए गए हवन व भोग की सुगन्ध ग्रहण करता है ।’ बस पंडितजी ने रुई उठाई और लगे बालगोपाल की नाक में ठूंसने ।




लेकिन यह क्या ! हंसते हुए बालगोपाल प्रकट हो गए और पंडितजी का हाथ पकड़ लिया । पंडितजी जड़वत् हो गए । कुछ क्षण बाद जब चेतना लौटी तो बालगोपाल से रुष्ट होकर बोले—‘पहले यह बता गोपाल, क्या तू नाक में रुई ठूंसने से प्रकट होता है । मैं छ: वर्ष से पूरे विधि-विधान से तेरा अर्चन करता रहा पर तब तूने दर्शन नहीं दिए और आज नाक में रुई ठूंसते ही प्रत्यक्ष हो गया ।’


बालगोपाल बोले—‘तुमने मेरा अर्चन किया ही कब ? तुम तो जड़ मूर्ति का पूजन करते रहे । तुमने मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा तो की पर उसमें मेरी उपस्थिति का भाव तुम्हें कभी नहीं आया । आज जब तुम्हें उस जड़ मूर्ति में मेरी उपस्थिति का आभास हुआ कि मैं मां को अर्पित किए गए हवन और भोग की गन्ध ग्रहण कर रहा हूँ और तुमने मुझे चेतन मान लिया तो मैं तुम्हारे सामने साक्षात् प्रकट हो गया ।’


पंडितजी ने बालगोपाल से कहा—‘‘तो मुझे मां के दर्शन क्यों नहीं हुए ?’ बालगोपाल हंसते हुए बोले—‘मां की मूर्ति को भी तुम जड़ मानकर पूजते रहे हो । मां तो सदैव तुम्हारे पास ही हैं । यह देखो, यह जड़ मूर्ति है या साक्षात् मां भद्रकाली ।’


पंडितजी की दृष्टि जैसे ही मां के सिंहासन की ओर गयी तो वहां मां भद्रकाली की मुस्कान बिखेरती वात्सल्यमयी मूर्ति विराजमान थी और वह करुणा भरे नेत्रों से पंडितजी को निहार रही थी । यह देखकर पंडितजी फुफकार मारकर रोने लगे और मां के चरणों से लिपट गए ।


कथा से शिक्षा!!!!!!


इस कथा से यह बात स्पष्ट होती है कि मूर्ति को जड़ वस्तु न मानकर चैतन्य मानकर पूजन करने से ही भगवान प्रकट होते हैं। मूर्ति पूजा केवल एक नियम के रूप में न करे मूर्ति को साक्षात् भगवान मान कर पूर्ण श्रद्धा व शरणागति से उनकी पूजा करनी चाहिए क्योंकि मूर्ति में बसते हैं भगवान।

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