मां ब्रह्मचारिणी देवी दुर्गा के नौ रूपों में से दूसरा रूप हैं। नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है।

 मां ब्रह्मचारिणी देवी दुर्गा के नौ रूपों में से दूसरा रूप हैं। नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। मां ब्रह्मचारिणी का अर्थ: "ब्रह्म" का अर्थ है "तपस्या" और "चारिणी" का अर्थ है "जो तपस्या करती है"। मां ब्रह्मचारिणी को तपस्या और संयम की देवी माना जाता है। मां ब्रह्मचारिणी की कथा: मां ब्रह्मचारिणी ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठिन तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया कि वे उनकी पत्नी बनेंगी। मां ब्रह्मचारिणी की विशेषताएं: - मां ब्रह्मचारिणी को शक्ति और संयम की देवी माना जाता है। - वे अपने भक्तों को तपस्या और संयम की शक्ति प्रदान करती हैं। - मां ब्रह्मचारिणी की पूजा से व्यक्ति को आध्यात्मिक ज्ञान और शक्ति प्राप्त होती है। मां ब्रह्मचारिणी की पूजा: नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। इस दिन विशेष रूप से मां ब्रह्मचारिणी की आराधना की जाती है और उन्हें फूल, फल और अन्य चीजें चढ़ाई जाती हैं।

भगवान श्रीकृष्ण द्वारा युधिष्ठिर को आत्म-तत्त्व का उपदेश!!!!!!!

 भगवान श्रीकृष्ण द्वारा युधिष्ठिर को आत्म-तत्त्व का उपदेश!!!!!!!




जैसे कठपुतली के नाच में कठपुतली और उसका नाच तो दर्शकों को दिखायी देता है; परन्तु कठपुतलियों को नचाने वाला सूत्रधार पर्दे के पीछे रहता है, जिसे दर्शक देख नहीं पाते हैं । उसी प्रकार यह संसार तो दिखता है; किन्तु इस संसार का सृष्टिकर्ता, पालनकर्ता और संहारकर्ता भगवान कहीं दिखायी नहीं देता है; इसीलिए मनुष्य स्वयं को ही कर्ता मानकर अहंकार में रहता है ।


‘अयम् ब्रह्म’ : महाभारत की कथा!!!!!!!


पाण्डवों का राजसूय यज्ञ चल रहा था । देश-विदेश के राजा-महाराजा तो आये थे ही, बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी इस यज्ञ में पधारे थे । उस समय बातों-ही-बातों में धर्मराज युधिष्ठिर ने कहा—‘मुझे अब तक परमात्मा के दर्शन नहीं हुए हैं ।’


श्रीकृष्ण पाण्डवों के साथ इतने दिनों से थे; किंतु कोई उन्हें पूरी तरह से पहचान नहीं सका था । धर्मराज युधिष्ठिर को तो यह पता नहीं था कि श्रीकृष्ण साक्षात् परब्रह्म परमात्मा हैं । राजसूय यज्ञ में श्रीकृष्ण को जूठी पत्तलें उठाते देख कर वह यही समझते थे कि यह तो मामा का लड़का है; इसलिए काम करता है । इसमें नई बात क्या है ? 


परमात्मा के सांनिध्य में रहते हुए भी वे परमात्मा को नहीं पहचान सके; किंतु नारद जी से रहा न गया । उन्होंने युधिष्ठिर से कहा—‘राजन् ! ये दुर्वासा, जमदग्नि जैसे बड़े-बड़े ऋषि-मुनि तुम्हारा मिष्ठान खाने और दक्षिणा लेने के लोभ से यहां नहीं आये हैं । ये लोग तुम्हारा कुछ भी लेने यहां नहीं आये हैं । ये तो यहां परब्रह्म परमात्मा के दर्शन करने के लिए आए हैं, जो तुम्हारे घर में विराजमान हैं । राजन् ! तुम बहुत सौभाग्यशाली हो, जो परमात्मा तुम्हारी इस सभा में उपस्थित है ।


धर्मराज युधिष्ठिर ने परमात्मा के दर्शन करने की इच्छा से चारों ओर नजर घुमाई; किंतु उन्हें कहीं भी भगवान के दर्शन नहीं हुए । श्रीकृष्ण की तरफ जब भी नजर गई तो उन्होंने यही समझा कि ये मेरे मामा के लड़के हैं ।


नारद जी ने कहा—‘विश्व को उत्पन्न करने वाले ब्रह्मा के पिता भी इसी सभा में हैं ।’


युधिष्ठिर ने कहा—‘कहां हैं ? मुझे तो कहीं दिखाई नहीं देते हैं ।’


श्रीकृष्ण ने सोचा—अब नारद जी चुप ही रहें तो अच्छा है । उन्होंने नारद जी को इशारा किया कि भाई, बंद कर दो अब अपनी कहानी; किंतु नारद जी से रहा न गया । उन्होंने मन में सोचा कि धर्मराज युधिष्ठिर अभी तक परमात्मा को पहचान नहीं सके हैं । मैंने धर्मराज के घर का अन्न खाया है । ब्राह्मण जिसका खाते हैं, उसका कल्याण करते हैं । आज चाहे परमात्मा नाराज हों तो हो;  मैं तो आज उन्हें जाहिर (प्रकट) करके रहूँगा ।


नारद जी ने श्रीकृष्ण की तरफ ऊंगली उठा कर कहा—‘अयम् ब्रह्म—ये ही ब्रह्म हैं । ऋषिगण इन्हीं के दर्शन करने आए हैं ।’


परमात्मा श्रीकृष्ण ने सिर झुका कर कहा—‘मैं ब्रह्म नहीं हूँ । नारदजी को को झूठ बोलने की आदत है ।’


मनुष्य प्रकट होना चाहता हैं । सभी मनुष्यों के मन में यह भावना छिपी रहती है कि संसार मुझे जाने; मेरा नाम-प्रसिद्ध हो; किंतु परमात्मा गुप्त रहना चाहते हैं । 


गीता (७।२५) में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—‘मैं सबके सामने प्रकाशित क्यों नहीं होता, लोग मुझे पहचानते क्यों नहीं ? क्योंकि मैं योगमाया से अपने को ढका रखता हूँ ।’ भगवान की लीला का आयोजन योगमाया ही करती है । संसारी जीवों के सामने भगवान की भगवत्ता को छुपा कर रखना आदि काम योगमाया करती हैं ।


भगवान श्रीकृष्ण द्वारा युधिष्ठिर को आत्म-तत्त्व का उपदेश!!!!!!


तब धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से आत्म-तत्त्व का उपदेश देने को कहा । भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को आत्मतत्त्व का वर्णन करते हुए कहा—


‘इस समय धर्म की स्थापना और दुष्टों के विनाश के लिए मैंने अपनी माया से मानव-शरीर में अवतार धारण किया है । जो लोग मुझे केवल मनुष्य समझ कर मेरी अवहेलना करते हैं, वे मूर्ख हैं । मैं ही देवताओं का आदि हूँ । ब्रह्मा आदि देवताओं की मैंने ही सृष्टि की है । ब्रह्मा से लेकर छोटे-से कीड़े तक में मैं व्याप्त हूँ । 


द्युलोक मेरा मस्तक, सूर्य और चन्द्रमा आंखें, गौ, अग्नि और ब्राह्मण मेरे मुख, वायु मेरी साँस, आठ दिशाएं मेरी बांहें, नक्षत्र मेरे आभूषण और अंतरिक्ष मेरा वक्ष:स्थल है । मेरे हजारों मस्तक, हजारों मुख, हजारों नेत्र, हजारों भुजाएं, हजारों उदर, हजारों उरु और हजारों पैर हैं । मैं पृथ्वी को सब ओर से धारण करके समस्त ब्रह्माण्ड से दस अंगुल ऊँचे अर्थात् सबसे परे विराजमान हूँ । 


प्रलयकाल में समस्त जगत का संहार करके उसे अपने उदर में स्थापित कर दिव्य योग का आश्रय ले मैं एकार्णव के जल में शयन करता हूँ । एक हजार युगों तक रहने वाली ब्रह्मा की रात पूर्ण होने तक महार्णव में शयन करके उसके बाद जड़-चेतन प्राणियों की सृष्टि करता हूँ । सभी मुझसे ही उत्पन्न होते हैं; फिर भी मेरी माया से मोहित होने के कारण मुझे नहीं जान पाते हैं । कहीं भी कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है, जिसमें मेरा निवास न हो । भूत, भविष्य जो कुछ है, वह सब मैं ही हूँ ।’


गीता में ऐसे बहुत-से श्लोक हैं, इनके अलावा महाभारत व श्रीमद्भागवत में ऐसे अनेक वाक्य हैं, जिनसे यह सिद्ध होता है कि श्रीकृष्ण पूर्ण परात्पर सनातन ब्रह्म हैं । कमलनयन श्रीकृष्ण ही सबकी आत्मा हैं । गीता (७।७) में वे स्वयं कहते हैं–


‘हे अर्जुन ! मेरे अतिरिक्त दूसरी कोई भी वस्तु नहीं है । माला के सूत्र में पिरोये हुए मणियों के समान यह समस्त ब्रह्माण्ड मुझमें पिरोया हुआ है ।’


मैं ही गति, भर्ता, प्रभु, साक्षी, शरण, निवास, सुहृद मैं ही ।

मैं उत्पत्ति, प्रलय, स्थान, निधान नित्य बीज मैं ही ।।

मैं ही मेघ रोकता, तपता, मैं ही बरसाता हूँ वृष्टि ।

मैं ही अमृत, मृत्यु भी मैं ही, सदसत् मैं ही सारी सृष्टि ।। (श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार)


हम सब के घरों में भी भगवान विराजमान हैं; परंतु उनको देखने की दिव्यचक्षु हमारे पास नहीं हैं । नारद जी जैसे संतों-गुरुओं की कृपा से हमें वैसी आंखें मिलें तो परमात्मा के दर्शन घर में ही हो सकेंगे ।

Comments

Popular posts from this blog

"भलाई का कार्य"

*कुसुम सरोवर का सुंदर प्रसंग

Sushant Singh rajput new movie release (Dil BECHARA)