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मां ब्रह्मचारिणी देवी दुर्गा के नौ रूपों में से दूसरा रूप हैं। नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है।

 मां ब्रह्मचारिणी देवी दुर्गा के नौ रूपों में से दूसरा रूप हैं। नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। मां ब्रह्मचारिणी का अर्थ: "ब्रह्म" का अर्थ है "तपस्या" और "चारिणी" का अर्थ है "जो तपस्या करती है"। मां ब्रह्मचारिणी को तपस्या और संयम की देवी माना जाता है। मां ब्रह्मचारिणी की कथा: मां ब्रह्मचारिणी ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठिन तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया कि वे उनकी पत्नी बनेंगी। मां ब्रह्मचारिणी की विशेषताएं: - मां ब्रह्मचारिणी को शक्ति और संयम की देवी माना जाता है। - वे अपने भक्तों को तपस्या और संयम की शक्ति प्रदान करती हैं। - मां ब्रह्मचारिणी की पूजा से व्यक्ति को आध्यात्मिक ज्ञान और शक्ति प्राप्त होती है। मां ब्रह्मचारिणी की पूजा: नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। इस दिन विशेष रूप से मां ब्रह्मचारिणी की आराधना की जाती है और उन्हें फूल, फल और अन्य चीजें चढ़ाई जाती हैं।

“रामायण” क्या है??

 “रामायण” क्या है??  अगर कभी पढ़ो और समझो तो आंसुओ पे काबू रखना....... रामायण का एक छोटा सा वृतांत है, उसी से शायद कुछ समझा सकूँ... 😊 एक रात की बात हैं, माता कौशल्या जी को सोते में अपने महल की छत पर किसी के चलने की आहट सुनाई दी।  नींद खुल गई, पूछा कौन हैं ? मालूम पड़ा श्रुतकीर्ति जी (सबसे छोटी बहु, शत्रुघ्न जी की पत्नी)हैं । माता कौशल्या जी ने उन्हें नीचे बुलाया | श्रुतकीर्ति जी आईं, चरणों में प्रणाम कर खड़ी रह गईं माता कौशिल्या जी ने पूछा, श्रुति ! इतनी रात को अकेली छत पर क्या कर रही हो बेटी ?  क्या नींद नहीं आ रही ? शत्रुघ्न कहाँ है ? श्रुतिकीर्ति की आँखें भर आईं, माँ की छाती से चिपटी,  गोद में सिमट गईं, बोलीं, माँ उन्हें तो देखे हुए तेरह वर्ष हो गए । उफ !  कौशल्या जी का ह्रदय काँप कर झटपटा गया । तुरंत आवाज लगाई, सेवक दौड़े आए ।  आधी रात ही पालकी तैयार हुई, आज शत्रुघ्न जी की खोज होगी,  माँ चली । आपको मालूम है शत्रुघ्न जी कहाँ मिले ? अयोध्या जी के जिस दरवाजे के बाहर भरत जी नंदिग्राम में तपस्वी होकर रहते हैं, उसी दरवाजे के भीतर एक पत्थर की शिला है...

भगवान का प्यारा भक्त कौन होता है??????

 भगवान का प्यारा भक्त कौन होता है?????? * मम गुन गावत पुलक सरीरा। गदगद गिरा नयन बह नीरा॥ काम आदि मद दंभ न जाकें। तात निरंतर बस मैं ताकें॥ भावार्थ:-मेरा गुण गाते समय जिसका शरीर पुलकित हो जाए, वाणी गदगद हो जाए और नेत्रों से (प्रेमाश्रुओं का) जल बहने लगे और काम, मद और दम्भ आदि जिसमें न हों, हे भाई! मैं सदा उसके वश में रहता हूँ॥ भगवान कोरे ज्ञान या कोरे कर्मकाण्ड, व व्रत-उपवास आदि से प्रसन्न होने वाले नहीं हैं, उनको ‘भक्त’ चाहिए । गले में माला डाल देने से, त्रिपुण्ड लगा लेने से, रामनामी ओढ़ लेने से ही कोई भक्त नहीं हो जाता । वह स्वभाव क्या है, जिससे आकर्षित होकर भगवान भक्त को खोजते फिरें, उसका पता पूछें, उससे मिलने के लिए रोते फिरें, अपने भक्त की चाकरी करें, वे गुण जिसके कारण भक्त भगवान को अत्यन्त प्यारा लगने लगता है—यह जानने की जिज्ञासा हर प्रेमीभक्त को होती है । भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के 12वें अध्याय के श्लोक 13-20 में अपने प्यारे भक्त के गुण या लक्षण बताए हैं– अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्र: करुण एव च । निर्ममो निरहंकार: समदु:खसुख: क्षमी ।।13।। संतुष्ट: सततं योगी यतात्मा दृढ़निश्चय: ।...

श्री हनुमानजी का राम-नाममय विग्रह!!!!!!!!!

 श्री हनुमानजी का राम-नाममय विग्रह!!!!!!!!! ‘राम नाम’ कीर्तन की श्री हनुमानजी का राम-नाममय विग्रह!!!!!!!!! ‘राम नाम’ कीर्तन की अति ऊंची अवस्था में पहुंचे हुए साधक का रोम-रोम भगवन्नाममय हो जाता है, ऐसे इतिहास में बहुत से उदाहरण हैं; परन्तु हनुमानजी तो उन सबमें विरले हैं । उनके रोम-रोम में तो राम-नाम अंकित है ही; उनके वस्त्र, आभूषण, आयुध--सब राम-नाम से बने हैं । जानें हनुमानजी की ‘राम नाम’ प्रियता की सरस कथाएं ।                  राम माथ, मुकुट राम, राम सिर, नयन राम, राम कान, नासा राम, ठोड़ी राम नाम है। राम कंठ, कंध राम, राम भुजा, बाजूबंद, राम हृदय, अलंकार, हार राम नाम है।। राम उदर, नाभि राम, राम कटि, कटि-सूत्र, राम वसन, जंघ राम, जानु-पैर राम हैं। राम मन, वचन राम, राम गदा, कटक राम, मारुति के रोम रोम व्यापक राम नाम है।। अपने आराध्य श्रीराम की सेवा के लिए शंकरजी का हनुमान अवतार!!!!!! त्रेतायुग में जब मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने पृथ्वी पर अवतार लेने का निश्चय किया, तब उनके पृथ्वी पर आने से पहले ही सभी देवता अपने-अपने अंशों से वानर तथा भ...

मूर्ति में क्यों बसते हैं भगवान?

मूर्ति में क्यों बसते हैं भगवान? क्यों भगवान मूर्ति में उपस्थित हो जाते हैं और पत्थर की मूर्ति भगवान बन जाती है ? भगवान के अर्चावतार से सम्बधित एक भक्ति कथा । किसी नए काम को शुरू करने से पहले या किसी स्थान पर जाने से पहले यह कहा जाता है कि मंदिर के दर्शन अवश्य करने चाहिए। इसके पीछे मान्यता यह है कि मंदिर के वातावरण में मौजूद सकारात्मक ऊर्जा आपके मस्तिष्क को स्वच्छ और सजीव कर, आपको सही दिशा में सोचने के लिए विवश करे। भक्तों की उपासना के लिए मूर्ति में बसते हैं भगवान:- अन्तर्यामी रूप से भगवान सबके हृदय में हर समय विद्यमान रहते हैं, सिद्ध, योगी आदि समाधि में भगवान के अन्तर्यामी रूप का दर्शन कर सकते हैं परन्तु सभी लोग इस रूप में भगवान के दर्शन का आनन्द नहीं ले पाते हैं।  भक्त अपने इष्ट का दर्शन कैसे करें? इसलिए भक्तों को दर्शन देने के लिए भगवान ने अर्चावतार धारण किया जो भगवान का सभी के लिए सबसे सुलभ रूप है। अर्चा का अर्थ है पूजा उपासना; इसके लिए होने वाले अवतार का नाम है अर्चावतार, मूर्तियों का ही दूसरा नाम अर्चावतार है। घर में, मन्दिरों में, तीर्थस्थानों पर, गोवर्धन आदि पर्वतों पर प्र...

श्राद्ध में अर्पित सामग्री पितरों को कैसे मिलती है?

 श्राद्ध में अर्पित सामग्री पितरों को कैसे मिलती है? ‘श्रद्धया दीयते यत् तत् श्राद्धम्।’   ‘श्राद्ध’ का अर्थ है श्रद्धा से जो कुछ दिया जाए। पितरों के लिए श्रद्धापूर्वक किए गए पदार्थ-दान (हविष्यान्न, तिल, कुश, जल के दान) का नाम ही श्राद्ध है। श्राद्धकर्म पितृऋण चुकाने का सरल व सहज मार्ग है। पितृपक्ष में श्राद्ध करने से पितरगण वर्षभर प्रसन्न रहते हैं।   श्राद्ध-कर्म से व्यक्ति केवल अपने सगे-सम्बन्धियों को ही नहीं, बल्कि ब्रह्मा से लेकर तृणपर्यन्त सभी प्राणियों व जगत को तृप्त करता है। पितरों की पूजा को साक्षात् विष्णुपूजा ही माना गया है।   श्राद्ध की वस्तुएं पितरों को कैसे मिलती हैं?   प्राय: कुछ लोग यह शंका करते हैं कि श्राद्ध में समर्पित की गईं वस्तुएं पितरों को कैसे मिलती है? कर्मों की भिन्नता के कारण मरने के बाद गतियां भी भिन्न-भिन्न होती हैं–कोई देवता, कोई पितर, कोई प्रेत, कोई हाथी, कोई चींटी, कोई वृक्ष और कोई तृण बन जाता है। तब मन में यह शंका होती है कि छोटे से पिण्ड से अलग-अलग योनियों में पितरों को तृप्ति कैसे मिलती है? इस शंका का स्कन्दपुराण में बहुत सुन्दर...

लक्ष्मीजी ने गोमय को क्यों चुना अपना निवास-स्थान ?????

 लक्ष्मीजी ने गोमय को क्यों चुना अपना निवास-स्थान ????? ऊँ नमो गोभ्य: श्रीमतीभ्य: सौरभेयीभ्य एव च। नमो ब्रह्मसुताभ्यश्वच पवित्राभ्यो नमो नम:।। अर्थात्—गौ को नमस्कार है, श्रीमती को नमस्कार है, सुरभि देवी को नमस्कार है, ब्रह्मसुता को नमस्कार है और परम पवित्र गौ को नमस्कार है । गाय सच्ची श्रीस्वरूपा (श्रीमती)!!!!!! इस श्लोक में गाय को श्रीमती कहा गया है क्योंकि सभी प्राणियों की विष्ठा अत्यन्त गन्दी और घृणित होती है और लक्ष्मीजी को चंचला कहा जाता है, वह लाख प्रयत्न करने पर भी स्थिर नहीं रहतीं किन्तु गौओं के गोमय (गोबर) में लक्ष्मीजी का शाश्वत निवास है इसलिए गौ को सच्ची श्रीमती कहा गया है ।  सच्ची श्रीमती का अर्थ है कि गोसेवा से जो श्री प्राप्त होती है उसमें सद्-बुद्धि, सरस्वती, समस्त मंगल, सभी सद्-गुण, सभी ऐश्वर्य, परस्पर सौहार्द्र, सौजन्य, कीर्ति, लज्जा और शान्ति–इन सबका समावेश रहता है । शास्त्रों में वर्णित है कि स्वप्न में काली, उजली या किसी भी वर्ण की गाय का दर्शन हो जाए तो मनुष्य के समस्त कष्ट नष्ट हो जाते हैं फिर प्रत्यक्ष गोभक्ति के चमत्कार का क्या कहना ?    ...