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मां ब्रह्मचारिणी देवी दुर्गा के नौ रूपों में से दूसरा रूप हैं। नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है।

 मां ब्रह्मचारिणी देवी दुर्गा के नौ रूपों में से दूसरा रूप हैं। नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। मां ब्रह्मचारिणी का अर्थ: "ब्रह्म" का अर्थ है "तपस्या" और "चारिणी" का अर्थ है "जो तपस्या करती है"। मां ब्रह्मचारिणी को तपस्या और संयम की देवी माना जाता है। मां ब्रह्मचारिणी की कथा: मां ब्रह्मचारिणी ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठिन तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया कि वे उनकी पत्नी बनेंगी। मां ब्रह्मचारिणी की विशेषताएं: - मां ब्रह्मचारिणी को शक्ति और संयम की देवी माना जाता है। - वे अपने भक्तों को तपस्या और संयम की शक्ति प्रदान करती हैं। - मां ब्रह्मचारिणी की पूजा से व्यक्ति को आध्यात्मिक ज्ञान और शक्ति प्राप्त होती है। मां ब्रह्मचारिणी की पूजा: नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। इस दिन विशेष रूप से मां ब्रह्मचारिणी की आराधना की जाती है और उन्हें फूल, फल और अन्य चीजें चढ़ाई जाती हैं।

*कुसुम सरोवर का सुंदर प्रसंग

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*कुसुम सरोवर का सुंदर प्रसंग  है*  एक समय राधा रानी और सारी सखियाँ फूल चुनने कुसुम सरोवर गोवर्धन में पहुँची, राधा रानी और सारी सखियाँ फुल चुनने लगी और राधा रानी से बिछड़ गयी और राधा रानी की साड़ी कांटो में उलझ गई। इधर कृष्ण को पता चला के राधा जी और सारी सखियाँ कुसुम सरोवर पे है। कृष्ण माली का भेष बना कर सरोवर पे पहुँच गये और राधा रानी की साड़ी काँटो से निकाली और बोले हम वन माली है इतने में सब सखियाँ आ गई। माली रूप धारी कृष्ण बोले हमारी अनुपस्थिति मे तुम सब ने ये बन ऊजाड़ दिया इसी नोक झोक मे सारे पुष्प पृथ्वी पे गिर गये। राधा रानी को इतने मे माली बने कृष्ण की वंशी दिख गई और राधा रानी बोली ये वन माली नही वनविहारी है। राधा रानी बोली ये सारे पुष्प पृथ्वी पे गिर गये और इनपे मिट्टी लग गई कृष्ण बोले मे इन्हें यमुना जल में धो के लाता हूँ। राधा रानी बोली तब तक बहुत समय हो जायेगा हमे बरसाना भी जाना है। तब कृष्ण ने अपनी वंशी से एक सरोवर का निर्माण किया जिसे *आज कुसुम सरोवर कहते हैं * और पुष्प धोये और राधा रानी की चोटी का फुलों से श्रृंगार किया। राधा रानी हाथ में दर्पण लेकर माली...